भरत भूषण तिवारी प्रकरण में राष्ट्रपति, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग एवं सुप्रीम कोर्ट को भेजा गया ई-मेल, संजय चौबे ने उठाए कई गंभीर सवाल
वाराणसी । किसान कांग्रेस उत्तर प्रदेश के पूर्व प्रदेश प्रवक्ता एवं पूर्व उपाध्यक्ष संजय चौबे ने दिनांक 17 जुलाई 2026 को जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि बिहार के भोजपुर जिले के शाहपुर प्रखंड के बिलौटी गांव निवासी भरत भूषण तिवारी की पुलिस मुठभेड़ की बिहार सरकार द्वारा गठित न्यायिक जाँच के अतिरिक्त उसकी निष्पक्षता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उन्होंने भारत के राष्ट्रपति, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तथा भारत के सर्वोच्च न्यायालय को ई-मेल भेजकर मामले का स्वतः संज्ञान लेने तथा विशेष जाँच दल (SIT) गठित कर जाँच की निगरानी कराने का आग्रह किया है। चौबे ने कहा कि सोशल मीडिया, फेसबुक लाइव वीडियो तथा विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार भरत भूषण तिवारी भोजपुर जिले के जवनिया गांव में प्रतिवर्ष आने वाली बाढ़ और कटाव से प्रभावित गरीब, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों की समस्याओं को लेकर लगातार अधिकारियों के पास जाते थे और उनके समाधान का प्रयास करते थे। उन्होंने कहा कि यदि इन रिपोर्टों में वर्णित बातें सही हैं, तो यह भी जाँच का विषय है कि आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियाँ बनीं कि समाज सेवा करने वाला एक युवक स्वयं को इतना अपमानित महसूस करने लगा कि उसने हथियार उठा लिया। चौबे ने कहा कि सोशल मीडिया पर उपलब्ध फेसबुक लाइव वीडियो में भरत भूषण तिवारी यह कहते हुए दिखाई दे रहे हैं कि पुलिस ने उनकी बात जिम्मेदार अधिकारियों तक पहुँचा दी है और यदि जवनिया गांव की समस्याओं का समाधान हो जाएगा तो वह हथियार छोड़कर आत्मसमर्पण कर देंगे। चौबे ने कहा कि सोशल मीडिया एवं मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इसके बाद उन्होंने आत्मसमर्पण किया। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया में यह भी दावा किया गया कि घटना के समय पुलिस के साथ एसटीएफ भी मौके पर मौजूद थी। यदि ये तथ्य सही हैं तो यह भी जाँच का विषय है कि एसटीएफ वहाँ किसके निर्देश पर पहुँची थी तथा पूरी कार्रवाई किन परिस्थितियों में हुई। चौबे ने कहा कि आज़ाद भारत में शायद यह पहला अवसर है जब पूजा-पाठ करने वाला, समाज सेवा करने वाला तथा गरीबों की समस्याओं को उठाने वाला एक युवक इस हद तक आहत हुआ कि उसने हथियार उठा लिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह किसी भी परिस्थिति में हथियार उठाने का समर्थन नहीं करते, लेकिन यह अवश्य जानना आवश्यक है कि ऐसी कौन-सी परिस्थितियाँ थीं जिन्होंने उसे ऐसा कदम उठाने के लिए मजबूर किया। उन्होंने कहा कि यदि इसकी गहन एवं निष्पक्ष जाँच होगी तो कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं और जाँच की आंच बड़े अधिकारियों अथवा सरकार तक भी पहुँच सकती है। चौबे ने कहा कि मीडिया रिपोर्टों के अनुसार भरत भूषण तिवारी के परिजनों ने दावा किया है कि घटना वाले दिन वह किसी वरिष्ठ अधिकारी से मिलने गए थे और बाढ़ पीड़ितों के लिए उपलब्ध लगभग 1400 करोड़ रुपये के राहत फंड से प्रभावित लोगों को सहायता दिलाने का प्रयास कर रहे थे। परिजनों के अनुसार उसी दौरान किसी बड़े अधिकारी द्वारा उनका अपमान किया गया, जिसके बाद घटनाक्रम ने गंभीर रूप ले लिया। चौबे ने कहा कि यदि यह दावा सही है तो इसकी निष्पक्ष जाँच होना अत्यंत आवश्यक है। चौबे ने कहा कि यदि यह सिद्ध होता है कि भरत भूषण तिवारी ने वास्तव में आत्मसमर्पण कर दिया था, तो भारतीय संविधान और कानून के अनुसार आत्मसमर्पण करने वाले व्यक्ति के साथ विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि संविधान किसी भी व्यक्ति को, चाहे वह आरोपी ही क्यों न हो, विधिक प्रक्रिया से वंचित करने की अनुमति नहीं देता। इसलिए आत्मसमर्पण के बाद हुई पूरी कार्रवाई की स्वतंत्र और निष्पक्ष जाँच आवश्यक है। चौबे ने कहा कि घटना के बाद बिहार सरकार के कई वरिष्ठ नेताओं एवं मंत्रियों ने सार्वजनिक रूप से पुलिस कार्रवाई का समर्थन किया तथा मीडिया रिपोर्टों के अनुसार मुख्यमंत्री ने भी एक सभा में बिना नाम लिए संबंधित व्यक्ति को मानसिक रोगी बताया था। उन्होंने कहा कि यदि ऐसा हुआ है तो इन बयानों की भी जाँच होनी चाहिए कि वे किन तथ्यों के आधार पर दिए गए थे। चौबे ने कहा कि सोशल मीडिया, फेसबुक लाइव, मीडिया रिपोर्टों एवं परिजनों के दावों से प्राप्त सभी तथ्यों और सूचनाओं को एक साथ जोड़कर देखा जाए तो प्रथम दृष्टया यह आशंका उत्पन्न होती है कि यह मामला केवल एक पुलिस कार्रवाई का नहीं, बल्कि किसी बड़े भ्रष्टाचार अथवा अन्य गंभीर तथ्यों से भी जुड़ा हो सकता है। उन्होंने कहा कि इन सभी आशंकाओं की पुष्टि या खंडन केवल एक स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जाँच से ही संभव है। अंत में चौबे ने राष्ट्रपति, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तथा भारत के सर्वोच्च न्यायालय से आग्रह किया कि मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए स्वतः संज्ञान लेकर स्वतंत्र विशेष जाँच दल (SIT) का गठन कराया जाए, ताकि सत्य देश के सामने आ सके तथा यदि किसी स्तर पर कानून का उल्लंघन हुआ है तो दोषियों के विरुद्ध निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित हो सके ।। रविन्द्र गुप्ता
