श्वांस रोगों की बढ़ती संख्या पर चिकित्सकों ने जतायी चिंता
काशी में आए देश-विदेश के प्रख्यात विशेषज्ञों ने किया श्वांस रोगों के ईलाज पर गहन मंथन
वाराणसी । ब्रेथ ईजी चेस्ट फाउंडेशन फॉर ह्यूमैनिटी, ब्रेथ ईजी टी.बी, चेस्ट, एलर्जी केयर अस्पताल (अस्सी, वाराणसी), इंडियन चेस्ट सोसाइटी एवं आई.एम्.ए (वाराणसी चैप्टर), उत्तर प्रदेश मेडिकल काउंसिल द्वारा प्रमाणित चिकित्सकीय संगोष्ठि एवम् चिकित्सकीय कार्यशाला का आयोजन 5 जुलाई 2026 (रविवार) को होटल रिवातास, वाराणसी में संयुक्त तत्वाधान से संपन्न हुआ जिसमे देश विदेश से आए हुए 300 से अधिक प्रख्यात चिकित्सक लोग सम्मिलित हुए और 10000 से अधिक वर्चुअल माध्यम से सम्मिलित हुए जिसमे मुख्य अतिथि पद्मश्री डॉ राजेंद्र प्रसाद (प्रोफेसर व विभागाध्यक्ष – एरा मेडिकल कॉलेज), विशिष्ठ अतिथि डॉ एस एन संखवार (निदेशक आई.एम.एस – बी.एच.यू), डॉ संजय गुप्ता (डीन - आई.एम.एस – बी.एच.यू), डॉ मुकेश कुमार (सी.एम.ओ – वाराणसी), जेसीएस इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली के चेयरमैन – डॉ जे सी सूरी, केजीएमसी लखनऊ के प्रोफेसर व विभागाध्यक्ष – डॉ सूर्यकांत त्रिपाठी, सीएमआरआई, कोलकाता के वरिष्ठ पल्मोनोलॉजिस्ट - डॉ राजाधर, ब्रेथ इज़ी हॉस्पिटल, वाराणसी के वरिष्ठ पल्मोनोलॉजिस्ट - डॉ एस के पाठक, प्रयागराज के वरिष्ठ पल्मोनोलॉजिस्ट - डॉ आशीष टंडन, एसजीपीजीआई, लखनऊ के वरिष्ठ पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ आलोक नाथ एवम् ब्रेथ ईजी हॉस्पिटल की निदेशिका डॉ सुनीता पाठक ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित किया। तदोपरांत अतिथियों ने ब्रेथ ईजी द्वारा प्रकाशित वार्षिक पत्रिका - “बी.ई टाइम्स” का विमोचन किया। ब्रेथ ईजी हॉस्पिटल की निदेशिका डॉ सुनीता पाठक ने सभी अतिथियों का स्वागत किया एवं स्मृति चिन्ह भेट किया। इस चिकित्सकीय संगोष्ठी में आए हुए सभी चिकित्सकों को उत्तर प्रदेश मेडिकल काउंसिल द्वारा 3 मेडिकल एकेडमिक क्रेडिट पॉइंट प्रदान किया गया।
मुख्य अतिथि डॉ पद्मश्री डॉ राजेंद्र प्रसाद ने डॉ. एस.के. पाठक द्वारा आयोजित इस चिकित्सकीय संगोष्ठी की सराहना करते हुए कहा कि – “ऐसे आयोजन न केवल चिकित्सकों को नवीनतम शोध और चिकित्सा प्रथाओं से परिचित कराते हैं, बल्कि चिकित्सक समुदाय के बीच आपसी संवाद और अनुभव-साझाकरण को भी बढ़ावा देते हैं। उन्होंने इस आयोजन को 'ज्ञानवर्धक, उपयोगी एवं प्रेरणादायी' करार दिया और डॉ. पाठक तथा उनकी टीम को इस सफल आयोजन के लिए हार्दिक बधाई दी।"
रेस्पिरेटरी कानक्लेव कांफ्रेंस 2026 के ऑर्गनाइजिंग सेक्रेट्ररी व् वरिष्ठ श्वांस एवं टी.बी रोग विशेषज्ञ डॉ. एस.के पाठक ने बताया कि - “ब्रेथ ईजी के प्रयास से भारत में तेरहवीं बार इस चिकित्सीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा हैं। इस चिकित्सकीय संगोष्ठी का उद्देश्य चिकित्सको को गंभीर श्वांस बीमारी के प्रति नयी पद्दिती की जानकारी के बारे में अवगत कराना हैं, जिससे मरीजों को श्वांस जैसी गंभीर बिमारियों से कम समय तथा कम खर्च में आसानी से ईलाज मिल सके I डॉ पाठक ने गंभीर श्वांस बीमारी के बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी दी और इससे बचने के विषय में भी प्रकाश डाला।”
जेसीएस इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली के चेयरमैन – डॉ जे सी सूरी ने बताया – “स्लीप एपेनिया (Sleep Apnoea) के प्रबंधन में हाल के वर्षों में कई महत्वपूर्ण और आधुनिक बदलाव आए हैं, जिससे मरीजों को पारंपरिक CPAP मशीन के अलावा भी कई बेहतर विकल्प मिल रहे हैं। पारंपरिक CPAP मशीनों की तुलना में अब नए उपकरण बहुत छोटे, शांत और यात्रा के अनुकूल (Travel-friendly) हो गए हैं। इनमें स्मार्ट एल्गोरिदम का उपयोग किया जाता है, जो मरीज के सांस लेने के पैटर्न के अनुसार हवा के दबाव को अपने आप एडजस्ट कर लेते हैं, जिससे नींद में असुविधा नहीं होती। इसके अलावा वैज्ञानिक अब ऐसी दवाओं पर भी शोध कर रहे हैं जो रात में गले की मांसपेशियों को शिथिल होने से रोक सकें। इसके अलावा, वजन घटाने वाली आधुनिक दवाओं (जैसे GLP-1 रिसेप्टर एगोनिस्ट) और जीवनशैली में बदलाव को अन्य उपचारों के साथ मिलाकर कॉम्बिनेशन थेरेपी के रूप में दिया जा रहा है।“
केजीएमसी लखनऊ के प्रोफेसर व विभागाध्यक्ष – डॉ सूर्यकांत त्रिपाठी द्वारा एक चिकित्सकीय कार्यशाला – पल्मोनरी रिहैबिलिटेशन का आयोजन किया गया, जिसमे श्वांस रोगियों के फेफड़ों की मजबूती के लिए परिचर्चा की गईं। डॉ त्रिपाठी ने ये भी बताया कि – “कठिन अस्थमा (Difficult Asthma) से तात्पर्य अस्थमा के उन मामलों से है, जहाँ उच्च खुराक वाली दवाओं (जैसे इनहेलर और स्टेरॉयड) के नियमित उपयोग और सही तकनीक के बावजूद मरीज के लक्षण नियंत्रण में नहीं आते और बार-बार अस्थमा के गंभीर दौरे पड़ते हैं। निदान की दोबारा जांच, इनहेलर तकनीक की समीक्षा, दवाओं की नियमितता, ट्रिगर्स और सह-रुग्णताओं (Co-morbidities) की पहचान के बारे में वृस्त्रित जानकारी दी।”
सीएमआरआई, कोलकाता के वरिष्ठ पल्मोनोलॉजिस्ट - डॉ राजाधर ने बताया – “टीबी के बाद फेफड़ों में कई तरह की समस्याएं देखी जा सकती हैं, जैसे - ब्रोंकिइक्टेसिस (Bronchiectasis): इसमें फेफड़ों की सांस की नलियां (Airways) स्थायी रूप से चौड़ी और ढीली हो जाती हैं, जिससे उनमें बलगम (Mucus) जमा होने लगता है और बार-बार इन्फेक्शन होता है। पल्मोनरी फाइब्रोसिस (Pulmonary Fibrosis): फेफड़ों के टिशू सख्त और मोटे (Scarred) हो जाते हैं, जिससे फेफड़े पूरी तरह फैल नहीं पाते और ऑक्सीजन सोखने की क्षमता घट जाती है।
कैविटी और एस्परजिलोमा (Cavities & Aspergilloma): टीबी के कारण फेफड़ों में जो गड्ढे (Cavities) बन जाते हैं, उनमें कभी-कभी फंगस (जैसे Aspergillus) का गोला बन जाता है, जिसे 'फंगस बॉल' कहते हैं। इससे खांसते समय खून आ सकता है। क्रोनिक एयरफ्लो ऑब्स्ट्रक्शन (Obstructive Airway Disease): यह काफी हद तक COPD या अस्थमा जैसी स्थिति होती है, जिसमें सांस की नलियां सिकुड़ जाती हैं और सांस छोड़ने में दिक्कत होती है।“
प्रयागराज के वरिष्ठ पल्मोनोलॉजिस्ट - डॉ आशीष टंडन ने बताया – “फेफड़ों और छाती से जुड़ी बीमारियों के इलाज में रेडियोलॉजी की भूमिका रीढ़ की हड्डी के समान है। बिना रेडियोलॉजी के छाती की बीमारियों का सटीक निदान और उपचार लगभग असंभव है।“
लखनऊ के वरिष्ठ पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ आलोक नाथ ने गर्भावस्था में अस्थमा के सुरक्षित और प्रभावी प्रबंधन के लिए विस्तृत जानकारी दी I डॉ नाथ ने बताया – “गर्भावस्था के दौरान अस्थमा को लेकर होने वाली माताओं का चिंतित होना बिल्कुल स्वाभाविक है। अक्सर यह डर रहता है कि दवाएं शिशु को नुकसान पहुंचा सकती हैं। लेकिन यहाँ एक बहुत ही महत्वपूर्ण मेडिकल तथ्य समझना जरूरी है: अस्थमा की दवाओं से शिशु को उतना खतरा नहीं है, जितना अस्थमा के अनियंत्रित रहने से है।“
अंत में मुख्य अतिथि पद्मश्री डॉ. राजेंद्र प्रसाद (प्रो. एवं विभागाध्यक्ष – एरा मेडिकल कॉलेज) ने चेस्ट सम्बंधित कुछ चुनिन्दा केस के बारे में चिकित्सको को जानकारी दी। डॉ प्रसाद ने आगे बताया कि –“इस चिकित्सीय संगोष्ठी का आयोजन, ब्रेथ ईजी के प्रयास से एक सराहनीय कार्य हैं। यह चिकित्सीय संगोष्ठी पूर्वांचल के चिकित्सको को गंभीर श्वांस के बीमारी के प्रति अपडेट करने में सहायक होगी। विगत कुछ वर्षो में ब्रेथ ईजी व डॉ. एस.के पाठक का चिकित्सीय क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान हेतु भारत सरकार के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की मुलाकात एक गौरवपूर्ण बात हैं।” इसके अलावा डॉ. राजेंद्र प्रसाद चेस्ट मेडिसिन के कुछ गोल्डन पॉइंट्स को नए चिकित्सको के सामने विश्लेषण किया और बताया सही समय में सही ईलाज से मरीजों का भला हो सकता हैं जिससे मरीज को कोल्लेप्स होने से बचाया जा सकता हैं।”
कार्यक्रम के समापन में रेस्पिरेटरी कॉन्क्लेव कांफ्रेंस 2026 के ओर्गैनिज़िंग सेक्रेटरी डॉ. एस.के पाठक ने सभी फैकल्टी को अंगवस्त्रम देकर सम्मानित किया और आए हुए सभी चिकित्सकों, मीडिया को एवं ऑनलाइन के मध्यम से जुड़े हुए सभी मेडिकल एवं नॉन मेडिकल लोगो को जुड़ने के लिए धन्यवाद किया ।। रविन्द्र गुप्ता
