वाराणसी । जीवन मुक्ति का पुंज काशी स्थित मणिकर्णिका तीर्थ का चक्र पुष्करणी कुंड (मणिकर्णिका कुंड) और ज्येष्ठ पूर्णिमा का गहरा पौराणिक एवं आध्यात्मिक संबंध है। चक्र पुष्करणी कुंड स्कंद पुराण के अनुसार सृष्टि के आरंभ से भी पहले का माना जाता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु ने इस स्थल पर हजारों वर्षों तक कठोर तपस्या की थी और उनके सुदर्शन चक्र से इस कुंड का निर्माण हुआ था ।
बाद में, जब भगवान शिव और माता पार्वती इस कुंड में स्नान कर रहे थे, तब माता पार्वती का एक दिव्य कर्णफूल (झुमका) इसमें गिर गया। तभी से इस कुंड का नाम 'मणिकर्णिका' पड़ा।
ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन काशी में मणिकर्णिका कुंड के पास स्थित श्री विष्णु चरण पादुका का विशेष और भव्य पूजन-अर्चन किया जाता है ।शास्त्रों के अनुसार, इसी स्थान पर भगवान विष्णु का प्राकट्य हुआ था और उनके द्वारा की गई तपस्या के कारण ही सदाशिव ने काशी की रचना की थी।
ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन इन पवित्र स्थानों पर स्नान करने और विधि-विधान से पूजा-पाठ करने से भक्तों को सभी पापों से मुक्ति, अक्षय पुण्य, और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है ।। रविन्द्र गुप्ता
