मथुरा । आपको बता दें कि ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा चल रही है आज स्वामी गौ पुत्र धर्म दास महाराज ने कुछ निम्न बातें बताई
(1) अहंकार की छाया में पूरी आसुरी संपति रहती हैं अहंकार पूर्वक किया हुआ भजन ध्यान कल्याण नहीं करता। मैं इतना जप करता हूं ऐसी गीता मुझे याद हैं मैं वक्ता हूं मैं पढ़ा लिखा हूं मैं ऐसी बातें जानता हूं ये बातें कल्याण नहीं करने वाली (ii) इंद्रियां हमें बाहर की दुनियां में भटकाती रहती हैं इसीलिये हम अपने असली स्वरूप को भूल जाते हैं सुख की खोज में बाहर दौड़ते हैं पर शांति नहीं मिलती। जो भीतर की ओर मुड़ता हैं वही आत्मा को पहचानता हैं और वही अमृत अर्थात मोक्ष (परम धाम की प्राप्ति) को प्राप्त करता हैं
(2) राम से बड़ा राम का नाम : श्री रामजी ने एक तपस्वी की स्त्री (अहिल्या) को ही तारा परंतु नाम ने करोड़ों दुष्टों की बिगड़ी बुद्धि को सुधार दिया श्री रामजी ने ऋषि विश्वामित्र के हित के लिये एक सुकेतु यक्ष की कन्या ताड़का की सेना और पुत्र (सुबाहु) की समाप्ति की परंतु नाम अपने भक्तों के दोष, दुःख और दुराशाओ का इस तरह नाश कर देता हैं जैसे सूर्य रात्रि का। श्री रामजी ने तो स्वयं शिवजी के धनुष को तोड़ा परंतु नाम का प्रताप ही संसार के सभी भयो का नाश करने वाला हैं।
(3) मन की तरंगें ही विकारों का मूल : विकार शरीर में नहीं मन की तरंगों में जन्म लेते हैं शरीर तो बस एक साधन हैं एक वाहन हैं असली खेल चित्त की वृतियों (मन की तरंगों) का हैं। जैसे शांत समुंद्र में सब स्पष्ट दिखाई देता हैं पर लहरें उठते ही दृश्य विकृत हो जाता हैं वैसे ही जब मन में काम क्रोध लोभ मोह अहंकार और ईर्ष्या (जलन) उठते हैं तो हम उन्हे ही "मैं" मान बैठते हैं (ii) जैसे समुंद्र के ऊपर बड़ी ऊंची ऊंची लहरें उठती हैं पर समुंद्र के भीतर मील आधा मील गहरा चले जाय तो वहां कोई क्रिया नहीं हैं। ऐसे ही संसार में बड़ी उथल पुथल होती हैं सृष्टि प्रलय होते हैं पर परमात्मा के स्वरूप में स्थित हो जाय तो वहां कोई हल चल नहीं हैं पूर्ण शांति हैं यह जीवनमुक्त अवस्था हैं।
(4) साधारण पुरुष के राग द्वेष पत्थर पर पड़ी लकीर के समान(दृढ़) होते हैं। विवेकी पुरुष के राग द्वेष आरंभ में बालू पर पड़ी लकीर के समान एवं विवेक की पूर्णता होने पर जल पर पड़ी लकीर के समान होते हैं। तत्वज्ञ पुरुष के राग द्वेष आकाश में पड़ी लकीर के समान (जिसमे लकीर खींचती ही नहीं केवल अंगुली दिखती हैं) होते हैं क्योंकि उसकी दृष्टि में संसार की स्वतंत्र सत्ता नहीं रहती (ii) कृपा का अथवा प्रारब्ध का यह अर्थ हैं ही नहीं कि अपनी तरफ से कुछ न करें इसका अर्थ हैं कि चिंता को छोड़ दो।अपना कर्तव्य छोड़ने में इसका अर्थ कभी हैं ही नहीं। अपनी तरफ से खूब उत्साह से तत्परता से उद्योग करो पर होगा भगवान की कृपा से, चिंता मत करो। प्रारब्ध का भी यही तात्पर्य हैं कि अपना उद्योग पूरा करो पर चिंता मत करो।
(5) गौ माता भव सागर पार करने वाली - गौ माता वो माता है इसकी सेवा करने वाले लोग भव सागर से पार हो जाते हैं वेद पुराणो में गौ माता की महिमा बताई है आज इस कलयुग में जगतगुरु बालमुकुंदा चार्य महाराज अयोध्या पीठाधीश्वर के नाते गौ पुत्र धर्म दास महाराज गौ माता के लिए पूरा जीवन समर्पित कर चुका है और गौ माता की कृपा से सम्पूर्ण भारत देश में निस्वार्थ भाव से चौबीसों घंटे सेवा और रक्षा करने व कराने में लगा हुआ है
(5) संत कैसे होते हैं जाने - संत हमेशा खुश रहते हैं वो केवल भगवान की मर्जी और इच्छा अनुसार कार्य करते हैं उन्हें पता होता है जो हो रहा है सब भगवान की कृपा से हो रहा है सच्चे संत सरल मन और शांत रहते हैं तथा *संत वचन पत्थर की रेखा*” एक कहावत है, जिसका पूरा दोहा इस तरह कहा जाता है:
संत वचन पत्थर की रेखा,
जो मिटे मिटे न जाय।
चाहे बरसे मेघ घन,
चाहे सीत घाम।_*
अर्थ: संतों की कही हुई बात पत्थर पर खींची गई लकीर के समान होती है – वो समय बीतने पर भी नहीं मिटती। चाहे बरसात हो, धूप हो या सर्दी, संत वचन अटल रहते हैं।
ब्रजवासी गौ रक्षक सेना भारत संगठन में एक से बढ़कर एक तपस्वी, खड़ेश्वरी, भजनानंदी और त्यागी संत महात्मा हैं सभी संतों, किन्नरों और नर नारियों का एक लक्ष्य है पूरे भारत देश में गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगा, गौ माता को राष्ट्र माता घोषित करना।
रिपोर्ट नंद किशोर शर्मा 151170853
