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यूपी, गोरखपुर, कुसम्ही बाजार l 43 वर्षों की गौरवपूर्ण अध्यापकीय यात्रा, अनुशासन और संस्कृत साधना के लिए मिला सम्मान
सेवानिवृत्ति के 25 वर्ष बाद भी क्षेत्र में कायम है उनकी विशिष्ट पहचान ।
प्रताप नारायण सिंह जनता इंटर कॉलेज, बरही सोनबरसा के पूर्व प्रधानाचार्य एवं संस्कृत साहित्य के प्रकाण्ड विद्वान् 87 वर्षीय रत्नेश्वर शुक्ल को उनके आवास पर अंगवस्त्र एवं प्रशस्ति-पत्र भेंट कर सम्मानित किया गया। ग्रीष्मावकाश प्रारम्भ होने की पूर्व संध्या पर आयोजित इस गरिमामय कार्यक्रम में नेहरू इंटर कॉलेज, अमहिया के प्रधानाचार्य डॉ. गिरिजेश कुमार पाण्डेय तथा विख्यात साहित्यकार शशिबिन्दुनारायण मिश्र ने उन्हें सम्मान प्रदान किया। इस अवसर पर संस्कृत शिक्षक शिशिर पाण्डेय भी उपस्थित रहे।
रत्नेश्वर शुक्ल ने प्रताप नारायण सिंह जनता इंटर कॉलेज, बरही सोनबरसा में 43 वर्षों तक अपनी उत्कृष्ट सेवाएँ प्रदान कीं। उन्होंने 38 वर्षों तक संस्कृत प्रवक्ता तथा अंतिम 5 वर्षों तक प्रधानाचार्य के रूप में कार्य किया। एक विद्वान, अनुशासित और कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक के रूप में उनकी पहचान पूरे क्षेत्र में सदैव सम्मानजनक रही है। उनकी प्रभावशाली वाणी, गहन अध्ययन और अध्यापन शैली के लोग आज भी प्रशंसक हैं।
संस्कृत साहित्य पर उनकी अद्भुत पकड़ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महाकवि बाणभट्ट कृत ‘कादम्बरी’ का ‘चन्द्रापीड कथा’ अंश, महाकवि कालिदास के ‘रघुवंशम्’ का द्वितीय सर्ग तथा महाकवि भास के ‘दूतवाक्यम्’ जैसे जटिल ग्रंथांश उन्हें आज भी पूर्णतः कण्ठस्थ हैं। वर्तमान समय में यह विद्वता अत्यंत दुर्लभ मानी जाती है।
प्रधानाचार्य रहते हुए उन्होंने अनुशासन, समयपालन, पारदर्शिता और अध्यापकीय गरिमा की जो परंपरा स्थापित की, वह आज भी शिक्षकों के लिए प्रेरणास्रोत बनी हुई है। सेवानिवृत्ति के 25 वर्ष बाद भी उनके सहकर्मी और शिष्य उनकी निष्पक्षता, उदारता और सादगीपूर्ण व्यक्तित्व की मुक्तकंठ से सराहना करते हैं।
रत्नेश्वर शुक्ल माँ दुर्गा के परम उपासक हैं। वर्ष 1959 से उन्होंने प्रतिदिन दुर्गासप्तशती का पाठ और एक समय भोजन का जो संकल्प लिया, वह आज 87 वर्ष की आयु में भी निरंतर जारी है। उनकी संयमित जीवनशैली और आध्यात्मिक साधना ही उनके स्वस्थ एवं प्रसन्न जीवन का आधार मानी जाती है।
उन्होंने संस्कृत की उच्च शिक्षा गोरखपुर विश्वविद्यालय में देश के प्रख्यात साहित्यकार एवं बहुभाषाविद् पं. विद्यानिवास मिश्र के सान्निध्य में प्राप्त की। शुक्ल जी आज भी पं. विद्यानिवास मिश्र को अपना आदर्श गुरु मानते हैं। इस दौरान भावुक होते हुए उन्होंने कहा कि “पं. विद्यानिवास मिश्र जैसा विद्वान गुरु मिलना आज के समय में अत्यंत दुर्लभ है।
