प्रदेश के 17 नॉन-अटेनमेंट शहरों की हवा की गुणवत्ता पर किए गए शोध में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। शोध में पाया गया है कि गोरखपुर और प्रयागराज में इस वर्ष पीएम-10 प्रदूषण बढ़ सकता है। शोध में बरेली और रायबरेली सबसे बेहतर साबित हुए हैं। यहां प्रदूषण में कमी की संभावना जताई गई है।
यह शोध अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के कम्युनिटी मेडिसिन एवं फैमिली मेडिसिन विभाग के डॉ. यू. वेंकटेश ने किया है। अध्ययन में वर्ष 2016 से 2023 तक उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) के मासिक एक्यूआई और पीएम-10 आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है।
डॉ.यू. वेंकटेश ने फेसबुक प्रॉफेट टाइम सीरीज मॉडल की मदद से 2025-26 तक की स्थिति का पूर्वानुमान लगाया। शोध के अनुसार, झांसी का एक्यूआई वर्ष 2023 में सबसे कम 72.73 दर्ज किया गया, जो ‘मॉडरेट’ श्रेणी में है।
वहीं, गोरखपुर का एक्यूआई लगातार ‘पुअर’ श्रेणी में रहा और 2019 में 249.31 तक पहुंच गया। पीएम-10 के मामले में गोरखपुर की स्थिति सबसे चिंताजनक रही। वर्ष 2019 में यहां पीएम-10 का स्तर 286.45 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर दर्ज किया गया।
पूर्वानुमान के अनुसार, वर्ष 2026 के अंत तक तक यह 50 प्रतिशत बढ़कर 243.55 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर तक पहुंच सकता है। ग्राफ में यह देखा गया है कि 2017 से 2023 तक प्रदूषण की मात्रा बढ़ी है। इस स्थिति में अभी तक कोई सुधार नहीं हुआ। डॉ.यू. वेंकटेश ने इसका सबसे बड़ा कारण गोरखपुर में बायोमास जलाने, तेजी से बढ़ते वाहन, औद्योगिकीकरण और कचरे का गलत निस्तारण बताया है।
दूसरी ओर बरेली सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाला शहर बनकर उभरा है। यहां पीएम 10 में 70 प्रतिशत से अधिक कमी का अनुमान है। रायबरेली में 58 प्रतिशत, मुरादाबाद में 55 प्रतिशत, गाजियाबाद में 48 प्रतिशत, आगरा में 41 प्रतिशत और वाराणसी में 40 प्रतिशत कमी आने की संभावना जताई गई है, जिससे ये शहर एनसीएपी के लक्ष्य हासिल कर सकते हैं।
शोध में यह भी सामने आया कि कोविड लॉकडाउन के दौरान 2020 में अधिकांश शहरों में प्रदूषण का स्तर घटा लेकिन मानकों से नीचे नहीं पहुंचा। शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि गोरखपुर और प्रयागराज जैसे शहरों में सड़क की धूल पर नियंत्रण, कूड़ा और बायोमास जलाने पर रोक, वाहनों की सख्त जांच और औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण जैसे कदम और तेज करने होंगे।
यह है एनसीएपी
राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी), 2019 में पर्यावरण मंत्रालय की ओर से 131 शहरों में वायु प्रदूषण को 2026 तक 40 प्रतिशत तक कम करने के लिए शुरू की गई एक राष्ट्रीय पहल है। ऐसे में बरेली, रायबरेली, मुरादाबाद, गाजियाबाद, आगरा और वाराणसी एनसीएपी श्रेणी में आ सकते हैं।
ये हैं नॉन-अटेनमेंट शहर
नॉन-अटेनमेंट शहर भारत के वे शहर हैं, जो पांच वर्षों से अधिक समय तक राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों को पूरा करने में विफल रहे हैं। इन शहरों की सूची में उत्तर प्रदेश के 17 शहर शामिल हैं। इसमें गोरखपुर के अलावा आगरा, इलाहाबाद, बरेली, फिरोजाबाद, गजरौला, गाजियाबाद, झांसी, कानपुर, खुर्जा, लखनऊ, मुरादाबाद, नोएडा, रायबरेली, वाराणसी और मेरठ शामिल हैं।
पीएम 10 और एक्यूआई के बारे में जानें
पीएम-10 हवा में मौजूद 10 माइक्रोमीटर से छोटे कण (धूल, पराग, धुआं) हैं, जो सांस के साथ फेफड़ों में जा सकते हैं, जबकि एक्यूआई (एयर क्वालिटी इंडेक्स) एक संख्यात्मक पैमाना है जो हवा की गुणवत्ता (जैसे अच्छी, खराब, खतरनाक) को दर्शाता है।
उच्च पीएम 10 स्तर (100 से ऊपर) सांस लेने में तकलीफ, अस्थमा और फेफड़ों की गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है। जब एक्यूआई 300 से अधिक होता है (गहरा लाल), तो इसे बहुत खराब माना जाता है। इससे श्वसन संबंधी (सांसी की बीमारी) समस्याओं वाले लोगों को घर के अंदर रहने की सलाह दी जाती है।
इन बिंदुओं पर किया गया अध्ययन
पीएम 10 प्रदूषण का अध्ययन
एक्यूआई का वर्षवार विश्लेषण
एनसीएपी (राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम) का प्रभाव
कोविड लॉकडाउन का असर
शहर में प्रदूषण की तुलना और बढ़ने के कारक
प्रदूषण नियंत्रण उपायों का अध्ययन रिपोर्ट - फूलमती मौर्य 151188511
