भारत के संवैधानिक सलाहकार बेनेगल नरसिंग राऊ का संविधान के इतिहास में एक नाम हमेशा उल्लेखनीय रहा है। आजकल यह चर्चा फिर से जोर पकड़ रही है कि क्या बेनेगल नरसिंग राऊ ने अपनी दूरदर्शिता और संवेदनशीलता से भारतीय समाज के सबसे वंचित तबकों दलितों और अछूतों के अधिकारों की नींव रखी थी, या फिर वे अपने ही वर्गीय हितों के विरुद्ध खड़े हुए एक असामान्य ब्राह्मण थे?
भारत के संवैधानिक सलाहकार बेनेगल नरसिंग राऊ की तारीफ करते हुए लोगो ने बताया कि पंडित बेनेगल नरसिंग राऊ जी की भूमिका केवल सलाहकार तक सीमित नहीं थी। वे बड़े ही दूरदर्शी, देशहितेषी एवं संवेदनशील और अच्छे विचारों वाले एक महान व्यक्ति थे। जो देश में ग़रीब अछूतों पर हो रहें अमानवीय अत्याचारों से दुःखी थे। इसीलिए वे ब्राह्मण होकर भी ब्राह्मणवाद और जातिवाद के विरुद्ध खड़े हुए एक असामान्य ब्राह्मण थे। कहा जाता है कि उन्होंने संविधान की प्रारूप-रचना के दौरान सुझाव के रूप में ऐसी अनुशंसाएँ दीं, जिन्होंने भारतीय समाज के सबसे वंचित तबकों दलितों और अछूतों के अधिकारों की नींव रखी और राष्ट्रहित में अपने ही वर्गीय हितों के विरुद्ध उन्हीने संबिधान सभा को महत्वपूर्ण सलाह दी थी कि वंचित ग़रीब अछूत दलितों के संरक्षण हित में एससी-एसटी एक्ट और आरक्षण को मजबूत तरिके से संबिधान में रखा जाएं।
उन्होंने आगे बताया कि सलाहकार पंडित बेनेगल नरसिंग राऊ जी कट्टर ब्राह्मण होकर भी भारतीय समाज के सबसे वंचित तबकों दलितों और अछूतों के विरोधी नहीं थे, इसलिए उन्होंने संविधान सभा को अपनी जाति के विरुद्ध जाकर अछूत दलितों के हित में महत्वपूर्ण सलाह दी थी। लेक़िन देश पर 60 साल राज़ करने के बाद भी कांग्रेस के काले कऊए ये बात कभी नहीं बताएंगे की अछूत दलित पर हो रहें अमानवीय अत्याचारों के कारण ही अछूत दलित को आरक्षण दिया जाता हैं। अछूतों से जाति के नाम पर गुंडागर्दी ना हो इसलिए एससी एसटी एक्ट का मजबूत तरिके से संबिधान में प्रावधान रखा गया। लेक़िन आज़ आरक्षण और एससी एसटी एक्ट को खत्म करने की बात तो सब करते हैं, मगर अछूत दलितों पर गुंडागर्दी कर रहें तत्वों को कोई बुद्धिजीवी ये नहीं समझाता की ये सब ग़लत हैं, अपनी मनमानी बंद करों। जिनके आधार पर अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षण तथा एससी-एसटी संरक्षण संबंधी प्रावधानों को ठोस रूप मिला।
लोगों का मानना है कि पंडित बेनेगल नरसिंग राऊ जी, एक उच्च ब्राह्मण परिवार से आने के बावजूद, समाज में व्याप्त जातिगत असमानता और अछूतों पर हो रहे अमानवीय अत्याचारों से गहराई से काफ़ी व्यथित थे। संभवतः इसी संवेदना ने उन्हें ऐसे सुझाव देने के लिए प्रेरित किया, जो बाद में भारतीय संविधान की आत्मा बन गए। हालांकि, उनके आलोचकों का तर्क है कि उनकी सोच उस समय के सामाजिक दबाव और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार आंदोलनों से प्रभावित थी। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि संविधान में आरक्षण और संरक्षण के प्रावधान पंडित बेनेगल नरसिंग राऊ जी की व्यक्तिगत विचारधारा से अधिक थे, जो अध्यक्ष डॉ. भीमराव अंबेडकर और संविधान सभा की सामूहिक चेतना का भी परिणाम थे।
फिर भी, एक प्रश्न आज भी प्रासंगिक है क्या पंडित बेनेगल नरसिंग राऊ जी वाकई ब्राह्मण होकर भी ब्राह्मणवाद और जातिवाद के विरुद्ध थे? या यह केवल इतिहास की एक रोचक व्याख्या है, जो समय-समय पर एक नई बहस को जन्म देती है?
रिपोर्ट नंदकिशोर शर्मा 151170853
