EPaper Join LogIn
एक बार क्लिक कर पोर्टल को Subscribe करें खबर पढ़े या अपलोड करें हर खबर पर इनकम पाये।

जय भीम के मंच पर सरकार का पाखंड, और पीछे UGC का हमला।।
  • 151188493 - SANJU KUMAR 0 0
    10 Apr 2026 18:51 PM



जय भीम के मंच पर सरकार का पाखंड, और पीछे UGC का हमला।।

 

सरकार का नया मॉडल बड़ा अद्भुत है। एक हाथ से मंच सजाओ, दूसरे हाथ से संस्थाएँ निगलो। एक तरफ “संविधान की चौपाल” लगाओ, दूसरी तरफ शिक्षा पर ऐसा पहरा बैठाओ कि विश्वविद्यालय, विश्वविद्यालय न रहें, दिल्ली के इशारे पर चलने वाले नोटिस बोर्ड बन जाएँ।।

 

ऊपर से “जय भीम” का नारा लगाओ, नीचे से UGC के नाम पर ऐसा ढांचा थोपो कि संवाद खत्म, असहमति संदिग्ध, और राज्यों की भूमिका औपचारिक रह जाए।  

यही है इस दौर का असली तमाशा—नारा आंबेडकर का, इरादा नियंत्रण का।।

 

सरकार को आजकल हर समस्या का एक ही इलाज सूझता है—फूल चढ़ाओ, फोटो खिंचवाओ, और असली सवाल को राष्ट्र-विरोधी शोर में डुबो दो।।

जब बेरोज़गारी पर जवाब न हो, तब उत्सव।।

जब शिक्षा नीति पर भरोसा न हो, तब इवेंट।।

जब विश्वविद्यालयों को मजबूत न कर सको, तब UGC के डंडे से उन्हें सीधा करने का दावा।।

और जब जनता पूछे कि यह सब किसके हित में है, तो तुरंत संविधान, समरसता और सुधार का पोस्टर सामने कर दो।।

 

सच यह है कि UGC rollback की मांग कोई सनक नहीं, सरकार के दंभ के खिलाफ लोकतांत्रिक जवाब है।  

जब नियम इतने व्यापक, इतने एकतरफा और इतने संदिग्ध हों कि छात्र सड़क पर उतरें, राज्य सरकारें विरोध दर्ज करें, और सुप्रीम कोर्ट तक कहे कि ये प्रावधान “too sweeping” हैं—तो समस्या विरोध में नहीं, मसौदे में होती है।। 

लेकिन सरकार की मुश्किल यह है कि उसे हर असहमति में दुश्मन दिखता है और हर सवाल में षड्यंत्र।।

 

यह कैसी विडंबना है कि मंच पर “संविधान” का नाम लिया जा रहा है, मगर नीति बनाते वक्त संवाद, संघवाद और संस्थागत संतुलन को ही किनारे कर दिया जाता है।  

छह विपक्ष-शासित राज्यों ने साफ कहा कि ड्राफ्ट UGC नियम राज्यों के अधिकारों को कमज़ोर करते हैं।।

कुलपति नियुक्ति जैसी प्रक्रियाओं में राज्यों की भूमिका घटाते हैं, और कई प्रावधान अत्यधिक केंद्रीकृत व दंडात्मक हैं।।

तो सवाल सीधा है—सरकार विश्वविद्यालय चला रही है या रिमोट कंट्रोल का साम्राज्य बना रही है।।

 

आज सत्ता का चरित्र इतना सतही हो चुका है कि उसे लगता है—आंबेडकर की तस्वीर लगा देने से आंबेडकर के सिद्धांत अपने आप लागू मान लिए जाएँगे।  

नहीं साहब, ऐसा नहीं होता।।

“जय भीम” बोल देने से कोई नीति लोकतांत्रिक नहीं हो जाती।।  

“समरसता” कह देने से केंद्रीकरण न्यायसंगत नहीं बन जाता।।

और “सुधार” शब्द लिख देने से हर सरकारी हमला सुधार नहीं कहलाता।।

अगर नीति में परामर्श नहीं, पारदर्शिता नहीं, संतुलन नहीं, तो वह सुधार नहीं—सत्ता का प्रशासनिक अहंकार है।।

 

यह जो सरकार विश्वविद्यालयों के नाम पर कर रही है, उसमें एक पुराना खेल साफ दिखता है— पहले संस्थाओं को कमजोर करो, फिर कहो कि हम मानक सुधार रहे हैं।  

पहले प्रक्रियाएँ उलझाओ, फिर कहो कि हम दक्षता ला रहे हैं।।  

पहले राज्यों की भूमिका घटाओ, फिर कहो कि हम राष्ट्रीय एकरूपता बना रहे हैं।।

और जब विरोध उठे, तो कहो कि देखिए, कुछ लोग प्रगति रोकना चाहते हैं।।

यानी गलती आपकी, सफाई आपकी, और कीमत देश के छात्रों-शिक्षकों की।।

 

UGC rollback का समर्थन इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यह सिर्फ एक नियम-पुस्तिका का सवाल नहीं है;  

यह तय करेगा कि भारत का उच्च शिक्षा तंत्र संवाद से चलेगा या फरमान से।। 

यह तय करेगा कि विश्वविद्यालयों में विविधता और स्वायत्तता बचेगी या सब कुछ एक ही राजनीतिक साँचे में ढाल दिया जाएगा।।

यह तय करेगा कि शिक्षा नीति विशेषज्ञता से बनेगी या प्रचार-तंत्र से।‌।

और सबसे अहम—यह तय करेगा कि संविधान का अर्थ सहभागिता है या सिर्फ सरकारी भाषण का बैकड्रॉप।।

 

सरकार को शायद लगता है कि जनता सिर्फ हेडलाइन पढ़ती है, फुटनोट नहीं। इसलिए हेडलाइन में “संविधान”, “समरसता”, “जय भीम”; और फुटनोट में केंद्रीकरण, नियंत्रण, दंडात्मक ढाँचा, और संस्थागत दखल।।

मगर दिक्कत यह है कि अब लोग हेडलाइन से ज्यादा मंशा पढ़ने लगे हैं। उन्हें दिख रहा है कि मंच पर सम्मान का अभिनय है, और फाइलों में अधिकारों की कटौती।।

 

सबसे बड़ा पाखंड यही है कि सरकार चाहती है तालियाँ भी मिलें, नियंत्रण भी मिले, सम्मान का नैरेटिव भी बने, सवालों से छूट भी मिले; “जय भीम” का जयघोष भी हो, और शिक्षा पर एकतरफा कब्ज़े का रास्ता भी साफ हो जाए।। 

लेकिन यह सौदा अब इतना आसान नहीं रहा। अगर संविधान सचमुच प्रिय है, तो rollback से डर कैसा।। अगर नियम निष्पक्ष हैं, तो व्यापक परामर्श से परहेज़ क्यों।।

अगर नीयत साफ है, तो राज्यों और छात्रों की आपत्ति को राजनीतिक शोर कहकर खारिज क्यों किया जा रहा है।।

 

इसलिए बात साफ है—UGC rollback कोई पीछे हटना नहीं, लोकतंत्र को ब्रेक फेल होने से बचाना है।  

सरकार को घमंड छोड़कर नियम वापस लेने चाहिए, व्यापक परामर्श करना चाहिए, राज्यों, शिक्षकों, छात्रों और विश्वविद्यालयों को बराबरी से सुनना चाहिए।

 

वरना “संविधान की चौपाल” का यह सारा दृश्य इतिहास में एक वाक्य में दर्ज होगा:  

मंच पर जय भीम बोला गया, और फाइलों में विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता नीलाम की गई।

 

सरकार को “जय भीम” बोलने का नहीं, “UGC rollback” सुनने का अभ्यास करना चाहिए—क्योंकि संविधान ताली से नहीं, जवाबदेही से चलता है!!

 



Subscriber

188651

No. of Visitors

FastMail

वाराणसी - दिल्ली में खराब मौसम का असर, सुरक्षा कारणों से दो उड़ानें वाराणसी डायवर्ट     वाराणसी - पांच हजार करोड़ से काशी बनेगा सिटी इकोनॉमिक रीजन, कैंट से बाबतपुर तक होगा रोपवे का विस्तार     वाराणसी - काशी विश्वनाथ धाम से मुखनिर्मालिका गौरी और मां विशालाक्षी शक्तिपीठ को भेजा गया उपहार     वाराणसी - काशी विश्वनाथ मंदिर की पहली गंगा आरती छह बजे होगी शुरू, 45 मिनट चलेगी; ललिता घाट पर निहारेंगे लोग     चंदौली - गुब्बारे में हवा भरने वाले गैस सिलिंडर में हुआ ब्लास्ट, दो घायल     चंदौली - निर्माणाधीन रेलवे ओवरब्रिज का स्लैब गिरा, गुणवत्ता पर उठे सवाल, सपा सांसद का धरना