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हनुमान जन्मोत्सव
  • 151168597 - RAJESH SHIVHARE 0 1
    01 Apr 2026 14:05 PM



हनुमान जन्म उत्सव विशेष 

हनुमान जी के बचपन की यह घटना जितनी रोमांचक है, उतनी ही सीख देने वाली भी है। यह कहानी हमें बताती है कि अत्यधिक शक्ति और चंचलता कभी-कभी संकट का कारण भी बन सकती है।

 

जब देवताओं ने हनुमान जी को अजेय होने के वरदान दिए, तो उनकी शक्ति और ऊर्जा असीमित हो गई। अब वह केवल एक साधारण वानर बालक नहीं थे, बल्कि ब्रह्मांड के सबसे शक्तिशाली प्राणी बन चुके थे। लेकिन थे तो वह आखिर एक बालक ही, और स्वभाव से अत्यंत चंचल!

हनुमान जी अक्सर ऋषियों के आश्रमों में चले जाते थे। वहाँ ऋषि-मुनि शांति से यज्ञ और तपस्या में लीन रहते थे। नन्हे हनुमान अपनी शक्तियों का प्रयोग करके कभी ऋषियों की दाढ़ी खींच देते, कभी उनके कमंडल का जल उलट देते, तो कभी उनके वल्कल (पेड़ों की छाल के वस्त्र) पेड़ों पर टांग देते।

ऋषिगण जानते थे कि यह बालक भगवान शिव का अंश है और पवन देव का पुत्र है, इसलिए वे उन पर क्रोध नहीं करते थे। लेकिन हनुमान जी की शरारतें दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही थीं। वह अपनी शक्ति के मद में इतने मगन थे कि बड़े-बड़े पर्वतों को खिलौनों की तरह फेंक देते थे।

 

एक बार हनुमान जी ने एक परम तपस्वी ऋषि के आश्रम में बहुत अधिक उत्पात मचाया। उन्होंने ऋषि के यज्ञ की वेदी को भंग कर दिया और उनके पवित्र कुश-आसन को आकाश में उड़ा दिया।

ऋषि ने देखा कि यह बालक अपनी शक्तियों का सही उपयोग नहीं समझ पा रहा है। उन्हें आभास हुआ कि यदि हनुमान अपनी शक्तियों को इसी तरह अनियंत्रित रखेंगे, तो संसार में व्यवस्था बनाए रखना कठिन हो जाएगा। साथ ही, हनुमान जी का असली उद्देश्य प्रभु श्री राम की सेवा करना था, जिसके लिए उनमें विनम्रता और धैर्य का होना अनिवार्य था।

तब उन तेजस्वी ऋषि ने हनुमान जी को एक 'हितकारी श्राप' दिया:

 "हे अंजनीपुत्र! तुम्हें अपनी इन शक्तियों का इतना अहंकार है कि तुम मर्यादा भूल रहे हो। जाओ, मैं तुम्हें श्राप देता हूँ कि तुम अपनी समस्त शक्तियों और पराक्रम को भूल जाओगे। तुम्हें अपनी शक्ति का आभास तब तक नहीं होगा, जब तक कोई अन्य तुम्हें तुम्हारी शक्तियों की याद न दिलाए।"

 

श्राप मिलते ही हनुमान जी एक साधारण वानर बालक की तरह शांत हो गए। उनके भीतर का सारा कोलाहल थम गया। उन्हें याद ही नहीं रहा कि वह सूर्य को निगल सकते हैं या समुद्र लांघ सकते हैं।

यही कारण था कि जब रावण माता सीता का हरण करके ले गया, तब भी हनुमान जी चुपचाप ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव के साथ बैठे रहे। उन्हें नहीं पता था कि वह अकेले ही पूरी लंका को भस्म करने का सामर्थ्य रखते हैं।

 

सालों बाद, जब वानर सेना समुद्र तट पर पहुँची और विशाल समुद्र को देख कर सब हताश हो गए, तब वृद्ध और बुद्धिमान जामवंत जी ने हनुमान जी को एकांत में बुलाया। जामवंत जी हनुमान जी के जन्म और उनके पराक्रम के साक्षी थे। उन्होंने हनुमान जी से कहा:

 "कवन सो काज कठिन जग माहीं, जो नहीं होइ तात तुम्ह पाहीं।"

(हे तात! संसार में ऐसा कौन सा कठिन कार्य है जो आप नहीं कर सकते?)

 

जैसे ही जामवंत जी ने हनुमान जी को उनके बचपन की कहानियाँ सुनाईं और उनके 'पवनपुत्र' होने की याद दिलाई, ऋषि का श्राप समाप्त हो गया। हनुमान जी का शरीर पर्वत जैसा विशाल होने लगा, उनकी आँखों में तेज आ गया और उन्होंने गर्जना करते हुए समुद्र लांघने की तैयारी की।

यह श्राप वास्तव में एक वरदान साबित हुआ, क्योंकि इसने हनुमान जी को अहंकार से मुक्त कर दिया और उन्हें 'परम भक्त' बनने के योग्य बनाया।

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