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यज्ञों में अश्वमेध यज्ञ और देवताओं में भगवान विष्णु श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार समस्त स्तोत्रों में दुर्गा सप्तशती श्रेष्ठ है - देवेन्द्र जी महाराज काशी।
  • 151114592 - DEVENDRA CHATURVEDI 0 0
    25 Mar 2026 17:55 PM



काशी के प्रख्यात संत देवेन्द्र जी महाराज ने नवरात्रि विशेष पर उपदेश क्रम में साधारण भाषा में बताया दुर्गा सप्तशती (जिसे देवी महात्म्य या चंडी पाठ भी कहते हैं) हिंदू धर्म का एक पवित्र ग्रंथ है जिसमें माँ दुर्गा की स्तुति में 700 मंत्र/श्लोक शामिल हैं। यह मार्कण्डेय पुराण का हिस्सा है और देवी दुर्गा की महिमा तथा आसुरी शक्तियों पर उनकी विजय का वर्णन करता है। नवरात्रि जैसे पर्वों पर इसे श्रद्धापूर्वक पढ़ने की परंपरा है। धर्मशास्त्रों में इसे अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र माना गया है, जो भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण करने वाला है । देवी के इस महागाथा का पाठ करने से भक्त को दिव्य शक्ति का अनुभव होता है तथा माँ दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए यह उत्तम उपाय माना गया है । दुर्गा सप्तशती में कुल 13 अध्याय हैं और इसे कवच, अर्ज़ला स्तोत्र तथा कीलकम सहित पूरा करने का विधान है । यह कथा मधु-कैटभ राक्षसों के वध से लेकर महिषासुर एवं शुम्भ-निशुम्भ जैसे असुरों पर देवी दुर्गा की विजय का विस्तृत बखान करती है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस ग्रंथ की महिमा का अंदाज़ा इसी से लगाया जाता है कि इसे सभी स्तोत्रों में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है – शास्त्र कहते हैं “जिस प्रकार यज्ञों में अश्वमेध यज्ञ और देवताओं में भगवान विष्णु श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार समस्त स्तोत्रों में दुर्गा सप्तशती श्रेष्ठ है” । इसे पढ़ने से साधक को भुक्ति (सांसारिक सुख) और मुक्ति (आत्मिक मोक्ष) दोनों की प्राप्ति हो सकती है, अतः इसे पावन से भी पावन ग्रंथ बताया गया है ।
धार्मिक महत्व हिंदू धर्म में दुर्गा सप्तशती पाठ को अत्यंत महत्वपूर्ण और फलदायी माना गया है। यह पाठ देवी दुर्गा को समर्पित सबसे प्रभावशाली स्तोत्रों में गिना जाता है। मान्यता है कि स्वयं देवी महादुर्गा इस पाठ से प्रसन्न होकर अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और उन्हें आशीर्वाद प्रदान करती हैं । देवी दुर्गा को “दुर्गतिनाशिनी” कहा गया है, अर्थात वह जो दुःख-दुर्गति का नाश करती हैं । सप्तशती पाठ में इसी कृपा का आह्वान होता है। धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि नवरात्रि के दिनों में इसका पाठ करने से विशेष पुण्य एवं माँ की कृपा प्राप्त होती है । अनेक संत-महात्माओं ने दुर्गा सप्तशती की महिमा गाई है और इसे शक्ति की उपासना का सार माना है । आध्यात्मिक दृष्टि से भी यह ग्रंथ महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें देवी को परब्रह्म की शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है और यह दर्शाया गया है कि सारी सृष्टि की शक्ति माँ दुर्गा ही हैं । भक्तजन इस पाठ के माध्यम से देवी के उसी सर्वव्यापी शक्ति स्वरूप से जुड़ते हैं। कुल मिलाकर, दुर्गा सप्तशती पाठ को भक्तों द्वारा देवी की आराधना, सुरक्षा एवं आशीर्वाद प्राप्त करने का एक अमोघ साधन माना गया हैदुर्गा सप्तशती पाठ को करने से आध्यात्मिक, मानसिक एवं सांसारिक (भौतिक) तीनों प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं। शास्त्रों और धर्मग्रंथों में इस पाठ के फल विस्तारपूर्वक बताए गए हैं। यहाँ मुख्य लाभों को वर्गीकृत रूप में प्रस्तुत किया गया है देवी की कृपा एवं मनोकामना पूर्ति: माँ दुर्गा की सप्तशती पढ़ने से उन पर उनकी विशेष कृपादृष्टि होती है। भक्त की सच्ची श्रद्धा से देवी प्रसन्न होकर मनोवांछित फल प्रदान करती हैं । दुर्गा सप्तशती के पाठ को मनोकामना पूर्ति का साधन कहा गया है – सत्प्रयोजन हेतु किया गया पाठ निश्चित रूप से इच्छाओं को पूर्ण करता है । देवी स्वयं घोषणा करती हैं कि इस गाथा को सुनने-पढ़ने वाले भक्तों की वह हर उचित कामना पूरी करेंगी, अतः इसे भक्तों के लिए अभय वरदान के समान माना गया है।

भक्ति एवं आत्मिक उन्नति: नियमित सप्तशती पाठ से साधक की भक्ति प्रगाढ़ होती है और आत्मिक शक्ति बढ़ती है। इस आध्यात्मिक साधना के प्रभाव से भक्त के अंदर शुद्धि, ज्ञान एवं सत्य के संस्कार दृढ़ होते हैं । फलस्वरूप साधक आध्यात्मिक मार्ग पर तेज़ी से अग्रसर होता है और उसे मोक्ष प्राप्ति का मार्ग सुगम दिखाई देने लगता है । शास्त्र कहते हैं कि सौ बार सप्तशती पाठ करने से अंततः मोक्ष जैसी परम सिद्धि भी सुलभ हो जाती है । अर्थात यह पाठ भौतिक बंधनों से मुक्त कर परमात्मा की प्राप्ति की ओर ले जाने वाला साधन है।

दिव्य संरक्षण व ऊर्जा: दुर्गा सप्तशती के जप-पाठ से एक दिव्य संरक्षक आवरण (कवच) भक्त के चारों ओर बन जाता है । माँ दुर्गा की शक्ति एक अदृश्य रक्षा-कवच की तरह साधक की रक्षा करती है और उसके सभी पाप-बाधाओं का नाश करती है । इससे नकारात्मक ऊर्जाएँ एवं दुष्ट शक्तियाँ पास नहीं फटकतीं। देवी के इस कवच का उल्लेख स्वयं दुर्गा सप्तशती में “देवी कवचम्” के रूप में होता है, जिसे प्रारंभ में पढ़ा जाता है। कुल मिलाकर, यह पाठ भक्त को आध्यात्मिक रूप से सशक्त करके हर तरह से सुरक्षित महसूस कराता है।
मानसिक एवं भावनात्मक लाभ य भयका नाश एवं साहस की प्राप्ति: दुर्गा सप्तशती पाठ भय को दूर करता है और दिल से डर निकाल देता है । चाहे अनजान भय हो या शत्रुओं का डर, इस पाठ से हर प्रकार के भय का निवारण संभव है । माँ दुर्गा अपने भक्तों को अभय प्रदान करती हैं, जिससे साधक निर्भीक होकर जीवन के चुनौतियों का सामना कर पाता है। कई लोग किसी भी प्रकार की भय या असुरक्षा की भावना दूर करने हेतु नियमित चंडी पाठ करते हैं । परिणामस्वरूप, पाठ करने वाले में अदम्य साहस का संचार होता है।चिंता एवं तनाव से मुक्ति: दुर्गा सप्तशती में वर्णित माँ की महिमा सुनने/पढ़ने से मन को अद्भुत शांति मिलती है। चिंताएँ, तनाव और मानसिक अशांति धीरे-धीरे दूर होने लगते हैं। उदाहरण स्वरूप, कहा गया है कि दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय का नियमित पाठ करने से सभी चिंताओं से मुक्ति मिलती है – यह सीधे साधक के मानसिक तनाव को कम करके उसे शांति प्रदान करता है। इसी प्रकार, अन्य अध्यायों का पाठ भी मन को एकाग्र करता है और नकारात्मक विचारों का क्षय करता है। भावनात्मक रूप से भी भक्त पहले से अधिक स्थिर और सकारात्मक महसूस करने लगता है।आत्मविश्वास एवं मनोबल में वृद्धि: माँ दुर्गा को शक्ति और ऊर्जा का स्रोत माना जाता है। उनका पाठ करने से साधक के भीतर वही शक्ति प्रवाहित होने लगती है। जो भक्त स्वयं को कमजोर या हताश अनुभव करते हैं, उन्हें विशेष रूप से यह पाठ करने की सलाह दी जाती है क्योंकि दुर्गा माँ शक्ति, साहस और सामर्थ्य का परम स्वरूप हैं । नियमित सप्तशती पाठ से साधक के आत्मविश्वास में वृद्धि होती है, निराशा दूर होकर आशा का संचार होता है । जीवन की चुनौतियों का सामना करने की आंतरिक शक्ति और सहनशीलता भी बढ़ती है । इस प्रकार मानसिक रूप से व्यक्ति दृढ़चित्त व उत्साही बनता है।

 



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