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नवरात्रि की चतुर्थी को पहनें पीले रंग के कपड़े धारण कर के भगवती का सेवा करें - देवेन्द्र जी महाराज काशी।
  • 151114592 - DEVENDRA CHATURVEDI 0 0
    21 Mar 2026 17:48 PM



काशी के प्रख्यात संत देवेन्द्र चतुर्वेदी जी महाराज ने भगवती दुर्गा के स्वरूप और नवरात्रि विशेष पर उपदेश करते हुए बताया कि नवरात्रि उत्सव के दौरान देवी दुर्गा के नौ विभिन्न रूपों का सम्मान किया जाता है एवं उन्हें पूजा जाता है, जिसे नवदुर्गा के नाम से भी जाना जाता है। देवी माँ या निर्मल चेतना स्वयं को सभी रूपों में प्रत्यक्ष करती हैं और सभी नाम ग्रहण करती हैं। माँ दुर्गा के नौ रूप और हर नाम में एक दैवीय शक्ति को पहचानना ही नवरात्रि मनाना है। असीम आनन्द और हर्षोल्लास के नौ दिनों का उचित समापन बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक पर्व दशहरा मनाने के साथ होता है। नवरात्रि पर्व की 9 रातें देवी माँ के 9 विभिन्न रूपों को समर्पित हैं, जिसे नवदुर्गा भी कहा जाता है। माँ दुर्गा का पहला ईश्वरीय स्वरुप शैलपुत्री है। शैल का अर्थ है शिखर। शास्त्रों में शैलपुत्री को पर्वत (शिखर) की बेटी के नाम से जाना जाता है। आमतौर पर यह समझा जाता है कि देवी शैलपुत्री कैलाश पर्वत की पुत्री हैं, लेकिन यह बहुत ही सतही विचार है। इसका योग के मार्ग पर वास्तविक अर्थ है चेतना का सर्वोच्चतम स्थान। यह बहुत दिलचस्प है कि जब ऊर्जा अपने चरम स्तर पर होती है तभी आप इसका अनुभव कर सकते हैं। इससे पहले कि यह अपने चरम स्तर पर न पहुँच जाए, तब तक आप इसे समझ नहीं सकते, क्योंकि चेतना की अवस्था का यह सर्वोत्तम स्थान है जो ऊर्जा के शिखर से उत्पन्न हुआ है। यहाँ पर शिखर का मतलब है हमारे गहरे अनुभव या गहन भावनाओं का सर्वोच्चतम स्थान। जब व्यक्ति 100% क्रोध में होता है तो महसूस करेगा कि क्रोध शरीर को कमजोर कर देता है। दरअसल हम क्रोध को पूरी तरह से व्यक्त नहीं करते। जब 100% क्रोध में होते हैं और पूरी तरह से क्रोध को व्यक्त करें तो इस स्थिति से जल्द ही बाहर निकल सकते हैं। जब 100% किसी भी चीज में होते हैं, तभी उसका उपभोग कर सकते हैं। ठीक इसी तरह जब क्रोध को पूरी तरह से व्यक्त करेंगे, तब ऊर्जा की उछाल का अनुभव करेंगे और साथ ही तुरंत क्रोध से बाहर निकल जाएंगे। क्या आपने कभी देखा है कि बच्चे कैसे व्यवहार करते हैं? जो भी वे करते हैं, 100% करते हैं। अगर वे क्रोध में हैं तो वे उस पल में 100% गुस्से में होते हैं और फिर कुछ ही मिनटों के बाद उस क्रोध को छोड़ देते हैं। अगर वे नाराज होते हैं तो भी वे थकते नहीं, लेकिन यदि आप क्रोध करते हैं तो आपका क्रोध आपको थका देता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि आप अपना क्रोध 100% व्यक्त नहीं करते। जब आप किसी भी अनुभव या भावना के शिखर तक पहुँचते हैं, तब आप दिव्य चेतना के उद्भव का अनुभव करते हैं, क्योंकि यह चेतना का सर्वोत्तम शिखर है। शैलपुत्री का यही वास्तविक अर्थ है। माँ शैलपुत्री की पूजा में ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्यै नम:’ मंत्र का जप करना चाहिए। नवरात्रि की प्रतिपदा को सफेद रंग के कपड़े पहनना शुभ माना जाता है। प्रतिपदा नवरात्रि के नौ रंगों में से एक है, जो देवी के विशिष्ट गुणों का प्रतीक है। माँ दुर्गा के दूसरे रूप का नाम माँ ब्रह्मचारिणी है। ब्रह्म का अर्थ है वह जिसका कोई आदि या अंत न हो, जो सर्वव्याप्त, सर्वश्रेष्ठ है और जिसके परे कुछ भी नहीं। जब आप आँखें बंद कर ध्यानमग्न होते हैं, तब अनुभव करते हैं कि ऊर्जा अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाती है और देवी माँ के साथ एक हो जाती है। दिव्यता, ईश्वर हमारे भीतर ही विद्यमान है। आप यह नहीं कह सकते कि “मैं इसे जानता हूँ”, क्योंकि यह असीम है। जिस क्षण आप इसे जान लेते हैं, यह सीमित हो जाता है। और आप यह भी नहीं कह सकते कि “मैं इसे नहीं जानता”, क्योंकि यह आपके भीतर ही है। इसलिए यह दोनों स्थितियाँ एक साथ चलती हैं। यदि कोई पूछे कि क्या आप देवी माँ को जानते हैं, तो इसका उत्तर देना कठिन है, क्योंकि यह अनन्त है और इसे किसी सीमा में बाँधा नहीं जा सकता। ब्रह्मचारिणी का अर्थ है वह जो अनन्त में विद्यमान और गतिमान है। यह सर्वव्यापक चेतना का प्रतीक है। माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा में ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नम:’ मंत्र का जप करना चाहिए। नवरात्रि की द्वितीया को लाल रंग के कपड़े पहनना चाहिए, जो शक्ति और क्रिया का प्रतीक है। माँ दुर्गा का तीसरा स्वरूप माँ चंद्रघंटा है। चंद्रमा हमारे मन का प्रतीक है, जो हमेशा परिवर्तनशील रहता है। मन में आने वाले नकारात्मक विचारों से बचने के लिए उन्हें समझना आवश्यक है। मन से भागने के बजाय उसे नियंत्रित करना ही साधना है। ‘चंद्र’ हमारे विचारों और भावनाओं का प्रतीक है और ‘घंटा’ एकाग्रता का। जब मन एकाग्र होकर ईश्वर में लग जाता है, तब दैवीय शक्ति का उदय होता है, जिसे चंद्रघंटा कहा जाता है। माँ चंद्रघंटा की पूजा में ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चन्द्रघंटायै नम:’ मंत्र का जप करना चाहिए। नवरात्रि की तृतीया को शाही नीले रंग के कपड़े पहनना चाहिए, जो शांति और ज्ञान का प्रतीक है। माँ दुर्गा का चौथा स्वरूप देवी कूष्मांडा है। कूष्मांडा का अर्थ कद्दू होता है, जो प्राणशक्ति और ऊर्जा का प्रतीक है। सम्पूर्ण सृष्टि एक गोलाकार ऊर्जा के रूप में है, जिसमें छोटे से बड़े तक सभी रूप समाहित हैं। देवी कूष्मांडा हमारे भीतर प्राणशक्ति के रूप में विद्यमान हैं। नवरात्रि की चतुर्थी को पीले रंग के कपड़े पहनना चाहिए, जो खुशी और ऊर्जा का प्रतीक है।

 



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