गाजियाबाद के लोनी बॉर्डर से एक ऐसी खबर आई है जिसने हर किसी की आंखों में आंसू ला दिए हैं। पटना के रहने वाले 34 वर्षीय बैंक मैनेजर अभिषेक शर्मा की उन्हीं के बैंक के गार्ड ने गोली मारकर हत्या कर दी। एक हंसता-खेलता परिवार पल भर में बिखर गया।
आखिरी बातचीत और अधूरे सपने:
घटना से ठीक एक रात पहले (15 मार्च) अभिषेक ने अपनी पत्नी राधिका से 12 मिनट बात की थी। उन्होंने कहा था- "अपना और बेटी का ख्याल रखना, अप्रैल में आऊंगा तो घूमने चलेंगे।" उन्हें क्या पता था कि यह उनकी आखिरी बात होगी। जून में उनकी बेटी परी का दूसरा जन्मदिन था, जिसकी योजनाएं उन्होंने फोन पर ही बना ली थीं।
ड्यूटी के प्रति समर्पण और दर्दनाक अंत:
अभिषेक 2016 में PO बने थे और अपनी मेहनत से सीनियर मैनेजर के पद तक पहुंचे। 16 मार्च की दोपहर, छुट्टी न मिलने से नाराज गार्ड रवींद्र हुड्डा ने अपनी लाइसेंसी बंदूक से अभिषेक के सीने में गोली उतार दी। डॉक्टरों के मुताबिक, 12 बोर की उस गोली ने उनके फेफड़े छलनी कर दिए थे।
बिखर गया परिवार:
अभिषेक की पत्नी 2 महीने की गर्भवती हैं और पति की मौत की खबर सुनकर बार-बार बेहोश हो रही हैं। उनके भाई अभिमन्यु का दर्द कलेजा चीर देने वाला है— "भैया अफसर बनकर आए थे, आज उनकी लाश कफन में लेकर जा रहा हूं।"
❓ समाज और व्यवस्था से कुछ तीखे सवाल:
1. जो गार्ड सुरक्षा के लिए तैनात था, वही भक्षक बन गया—क्या बैंकों को अपने सुरक्षाकर्मियों की 'मानसिक स्थिति' (Mental Screening) की जांच नहीं करनी चाहिए?
2. एक होनहार अफसर की बैंक के भीतर हत्या हो जाना, क्या यह बैंक प्रबंधन और सिक्योरिटी कंपनी की बड़ी लापरवाही नहीं है?
3. छोटी सी नाराजगी (छुट्टी न मिलना) पर किसी की जान ले लेना—समाज में बढ़ता यह हिंसक व्यवहार किस ओर इशारा कर रहा है?
4. उस 2 साल की मासूम बच्ची और होने वाले बच्चे का क्या कसूर, जिनका साया सिर से उठ गया?
क्या हत्यारोपी गार्ड को कड़ी से कड़ी सजा नहीं मिलनी चाहिए?
