हिमाचल के 'ज्वालामुखी मंदिर' में बिना किसी ईंधन के हज़ारों साल से '9 अखंड ज्वालाएं' जल रही हैं!
अकबर ने इस आग को बुझाने के लिए नहर तक मुड़वा दी और लोहे के मोटे तवे रख दिए, पर 'दिव्य शक्ति' के आगे उसकी एक न चली!
विज्ञान कहता है कि बिना ऑक्सीजन या ईंधन (Fuel) के आग नहीं जल सकती, लेकिन हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले में 'ज्वालामुखी' मंदिर में जाकर आपका लॉजिक फेल हो जाएगा! यहाँ ज़मीन से सीधी 9 अलग-अलग लपटें निकल रही हैं, जो सदियों से बिना बुझे जल रही हैं। ये ज्वालाएं कहाँ से आती हैं? इनका स्रोत क्या है? यह आज तक दुनिया के टॉप भूवैज्ञानिकों (Geologists) के लिए एक अनसुलझा सस्पेंस है। मुगल बादशाह अकबर ने इसे 'जादू' समझकर बुझाने की पूरी कोशिश की—उसने आग पर लोहे के विशाल तवे रखवाए ताकि दम घुटने से आग बुझ जाए, और जब उससे काम नहीं बना, तो उसने पूरी नहर का पानी ज्वालाओं पर डलवा दिया। लेकिन चमत्कार देखिए, आग पानी के ऊपर भी जलती रही! हार मानकर अकबर को नंगे पैर यहाँ आकर सोने का छत्र चढ़ाना पड़ा था।
➡️ फैक्ट्स:
• ज्वालामुखी मंदिर (Jwala Ji), हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले में स्थित है।
• यहाँ की 9 ज्वालाएं—महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका और अंजनी के नाम से जानी जाती हैं।
• ONGC के वैज्ञानिकों ने सालों तक रिसर्च की, ज़मीन के नीचे हज़ारों फीट खुदाई की, पर उन्हें कोई 'नेचुरल गैस' का सोर्स नहीं मिला।
• यहाँ कोई मूर्ति नहीं है, जलती हुई ज्वालाओं को ही साक्षात 'देवी' मानकर पूजा जाता है।
• अकबर द्वारा चढ़ाया गया सोने का छत्र 'एक रहस्यमयी धातु' में बदल गया था, जिसे आज भी देखा जा सकता है।
• मॉडर्न थर्मल इंजीनियरिंग आज तक यह नहीं समझ पाई कि बिना किसी पाइपलाइन के ये लपटें हज़ारों साल से कैसे जल रही हैं!
✨ अकबर की ज़िद हारी, हार गया विज्ञान का सारा ज्ञान,
ज्वाला जी की ज्योति में बसता है मेरे प्रभु का वरदान।
