वाराणसी । गौ-संरक्षण भारतीय संस्कृति, आस्था और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय है। ऐसे विषयों पर समाज को भ्रमित करने या राजनीतिक लाभ लेने के उद्देश्य से अभियान चलाना उचित नहीं कहा जा सकता। तथाकथित शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा उत्तर प्रदेश में गौ-रक्षा के नाम पर जो यात्रा प्रारंभ की गई है, वह वास्तविक संरक्षण से अधिक एक राजनीतिक प्रोपेगेंडा प्रतीत होती है। यह वक्तव्य अधिवक्ता शशांक शेखर त्रिपाठी, वरिष्ठ उपाध्यक्ष – द बनारस बार एसोसिएशन तथा संयोजक – भारतीय जनता पार्टी, विधि प्रकोष्ठ, काशी क्षेत्र द्वारा जारी किया गया है। उन्होंने कहा कि यदि किसी धार्मिक पीठ या संत द्वारा गौ-संरक्षण की चिंता व्यक्त की जाती है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए, किंतु यह भी आवश्यक है कि उस चिंता का वास्तविक कार्यों में भी प्रतिबिंब दिखाई दे। त्रिपाठी ने कहा कि जिस पीठ पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने स्वयं को स्थापित करने का दावा किया है, उस पीठ की ओर से अब तक गौ-संरक्षण के लिए कोई ठोस योजना, गौशाला निर्माण, निराश्रित गौवंश के संरक्षण की व्यवस्था या ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ा कोई स्थायी मॉडल सामने नहीं आया है। यदि वास्तव में गौ-संरक्षण की चिंता होती, तो उस पीठ के संसाधनों और सामाजिक प्रभाव का उपयोग देशभर में गौ-सेवा की ठोस योजनाओं के माध्यम से किया जा सकता था। इसके विपरीत उत्तर प्रदेश सरकार ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में गौ-संरक्षण के क्षेत्र में व्यापक और कठोर कदम उठाए हैं। राज्य में उत्तर प्रदेश गो-वध निवारण अधिनियम को प्रभावी रूप से लागू करते हुए अवैध गो-वध और पशु तस्करी के विरुद्ध लगातार कार्रवाई की जा रही है। पुलिस और विशेष टास्क फोर्स द्वारा हजारों आरोपियों की गिरफ्तारी की गई है तथा कई मामलों में गैंगस्टर एक्ट जैसे कठोर कानून लागू किए गए हैं। अवैध बूचड़खानों के विरुद्ध कार्रवाई करते हुए अनेक इकाइयों को बंद कराया गया है, जिससे गो-तस्करी और अवैध वध पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित हुआ है। त्रिपाठी ने कहा कि सरकार ने केवल कानून तक ही स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए निराश्रित गौवंश के संरक्षण के लिए राज्यभर में बड़ी संख्या में गौशालाओं की स्थापना और विस्तार किया है। लाखों निराश्रित पशुओं के संरक्षण की व्यवस्था विकसित की गई है, जिनकी देखभाल के लिए वित्तीय सहायता, आधुनिक सुविधाएँ और निगरानी व्यवस्था भी स्थापित की गई है। “आदर्श गौशाला” जैसी योजनाएँ गौ-संरक्षण को ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ने का प्रयास कर रही हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब राज्य सरकार द्वारा ठोस और संस्थागत स्तर पर गौ-संरक्षण के लिए कार्य किए जा रहे हैं, तब केवल राजनीतिक वक्तव्यों और यात्राओं के माध्यम से वातावरण को भ्रमित करना समाज के हित में नहीं है। गौ-संरक्षण कोई राजनीतिक मंच का विषय नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। त्रिपाठी ने अंत में कहा कि यदि कोई भी संत या संगठन वास्तव में गौ-संरक्षण के लिए कार्य करना चाहता है, तो उसे राजनीति से ऊपर उठकर ठोस योजनाओं और सामाजिक सहभागिता के माध्यम से आगे आना चाहिए। समाज को भी चाहिए कि वह वास्तविक कार्य और केवल प्रचार के बीच का अंतर समझे। रविन्द्र गुप्ता 151009219
