प्रयागराज। समय का बंधन दान में नहीं होना चाहिए, क्योंकि जरूरतमंद को सहायता की आवश्यकता कभी भी पड़ सकती है। यह उद्बोधन व्यास आचार्य ने सुरवल चंदेल में आयोजित श्रीमद् शिवपुराण कथा ज्ञान यज्ञ के ग्यारहवें दिन भक्त–भगवान एवं नारद प्रसंग का वर्णन करते हुए व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार शरीर नित्य नए-नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा भी भगवान द्वारा निर्मित चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करती हुई मानव शरीर रूपी सर्वश्रेष्ठ वस्त्र प्राप्त करती है। मानव जन्म अत्यंत दुर्लभ और पुण्यफल का परिणाम है। भवसागर से पार लगाने वाले भगवान शिव कंकड़ को भी शंकर बना देने की शक्ति रखते हैं। जब कंकड़ से शंकर बन सकते हैं तो मनुष्य काम, क्रोध और मोह का त्याग कर शुद्ध आचरण वाला मानव क्यों नहीं बन सकता।
कथा में कालगणना का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि सभी देवताओं के दिन और काल की गणना भिन्न-भिन्न है। ब्रह्मा के सौ वर्षों की अवधि में लगभग पांच लाख चालीस हजार इन्द्र बदल जाते हैं। जो सदा शिव का समय है वही शत और शून्य का रहस्य है। शंका से मुक्त व्यक्ति ही शंकर के वास्तविक स्वरूप को जान पाता है।
उन्होंने शिव तत्व का वर्णन करते हुए कहा कि रस से जल, जल से गंध और गंध से पृथ्वी की उत्पत्ति होती है, यही भगवान शिव का स्वरूप है। जो ‘नार’ अर्थात जल में शयन करते हैं, वही नारायण कहलाते हैं। अंततः मनुष्य के कर्म ही उसके सुख-दुख के दाता होते हैं।
कथा ज्ञान यज्ञ में यजमान रत्नाकर सिंह, प्रभा सिंह, मालती सिंह, महेश सिंह, रामकैलाश शुक्ल, महेंद्र कुमार शुक्ल, राजीव लोचन तिवारी, सूर्यकांत शुक्ल, लालजी केसरवानी, ग्राम प्रधान संतोष सिंह सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। रिपोट - दिलीप कुमार चतुर्वेदी 151172563
