काशी के प्रख्यात देवेन्द्र चतुर्वेदी जी महाराज "हमारी काशी" इस सांस्कृतिक कार्यक्रम मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे और इस कार्यक्रम के माध्यम से काशी के बारे में उसका महत्व और उपयोगिता सहित अन्यान्य विषयों पर चर्चा के माध्यम से लोगों से बताया और यह कार्यक्रम का प्रथम दिवस रहा महाराज श्री ने बताया
काशी’ शब्द का अर्थ है - 'प्रकाशमान'। यानी जो प्रकाशित है, प्रकाश का स्रोत है, या कहें तो 'प्रकाश स्तंभ'! मार्क ट्वेन ने कहा था कि काशी इतिहास की दंतकथाओं से भी पुरानी है। इस नगर के अस्तित्व में आने के समय का कोई पता नहीं लगा सकता। जब एथेंस की कल्पना भी नहीं की गयी थी, तब भी काशी थी। जब रोम का कहीं कोई अस्तित्व नहीं था, तब भी काशी थी। जब इजिप्त नहीं था, तब भी काशी थी। ये उतनी पुरानी है। यह एक साधन था जो एक नगर के रूप में बनाया गया था, और जो सूक्ष्म का विराट के साथ मेल कराता है। ये दिखाता है कि छोटा सा मनुष्य ऐसी अद्भुत संभावना रखता है कि वह ब्रह्मांडीय स्वभाव के साथ एक होने के आनंद, उल्लास और उसकी सुंदरता को जान सके।
जब एथेंस की कल्पना भी नहीं कि गयी थी, तब भी काशी थी। जब रोम का कहीं कोई अस्तित्व नहीं था, तब भी काशी थी। जब इजिप्त नहीं था, तब भी काशी थी।
हमारे देश में कई ऐसे साधन हैं, पर एक पूरा शहर बनाने को तो एक पागल महत्वाकांक्षा ही कहा जायेगा - और वो भी उन्होंने हज़ारों साल पहले किया था। इस शहर में 72,000 मंदिर थे और ये संख्या वही है जो हमारे शरीर में नाड़ियों की होती है। इस शहर की रचना एक विशाल मानव शरीर की अभिव्यक्ति है, जिसके ज़रिये ब्रह्मांडीय शरीर के साथ संपर्क किया जा सके। इसी वजह से ये परंपरा बनी थी कि अगर आप काशी चले जाते हैं, तो ये हो जाता है। आप उस जगह को छोड़ना नहीं चाहेंगे क्योंकि जब आप ब्रह्मांडीय स्वभाव से जुड़ जाते हैं तो फिर आप कहीं और क्यों जाना चाहेंगे?
आज जब हम विज्ञान की बात करते हैं तो हमारे दिमाग में आता है - आई फोन! पर अगर आप मानवीय खुशहाली के रूप में विज्ञान को देखना चाहें तो वो काशी ही है। आप इससे बेहतर कुछ नहीं कर सकते। ये कोई धर्म या विश्वास की बात नहीं है। ये मानवीय समझ की बात है कि इस संसार से जो परे है, उस तक पहुँच कैसे बनायें? इस धरती पर किया गया ये सबसे अद्भुत प्रयास है। इसके बारे में कोई सवाल ही नहीं है।
मनुष्य जीवन में सबसे बड़ा काम है अपने शरीर की सीमितताओं को जानना! आप कल पैदा हुए थे और कल मर जायेंगे। आपके पास जीने के लिये बस आज का ही दिन है। ये अस्तित्व का स्वभाव है। और, मौत आने के पहले जीवन खिलना चाहिये। तो हमारे देश में हमने ऐसी हर संभव व्यवस्था बनायी जिसका उपयोग इस मकसद के लिये हो सके। इस तरह के बहुत से तंत्र हैं, व्यवस्थायें हैं। दुर्भाग्य से उनमें से ज्यादातर टूट गये हैं। जिनमें काशी भी शामिल है जो बड़ी मात्रा में अशांत है पर उसका ऊर्जा स्वरूप अभी भी जीवंत है। इसका कारण ये है कि जब इस तरह के स्थानों को प्राणप्रतिष्ठित किया जाता है (जिनमें ध्यानलिंग भी शामिल है), तो भौतिक संरचना सिर्फ एक मचान की तरह होती है। सामान्य रूप से ऐसा माना जाता है कि काशी ज़मीन पर नहीं है बल्कि शिव के त्रिशूल पर स्थित है।
ऐसा माना जाता है कि काशी ज़मीन पर नहीं है बल्कि शिव के त्रिशूल पर स्थित है।
मेरे अनुभव में, मैं जो देखता हूँ वो ये है कि काशी ज़मीन से लगभग 33 फुट ऊपर है। अगर हममें कुछ भी समझ होती तो हमने 33 फुट से ऊँचा कुछ भी नहीं बनाया होता, पर हमने बनाया है क्योंकि इस संसार में समझ एक बहुत ही कम मिलने वाली चीज़ है। और ज्यामितीय गणनाओं के हिसाब से ऊर्जा संरचनायें 7200 फ़ीट तक की हो सकती हैं। यही कारण है कि काशी को प्रकाश स्तंभ कहा गया क्योंकि जिनके पास देखने के लिये आँखें और समझ थी, उन्हें पता था कि ये एक बहुत ऊँची संरचना है। और, ये सिर्फ ऊँचे होने की ही बात नहीं थी बल्कि इसने आपको उस तक की पहुँच दी जो इस सब से परे है। इसके पीछे सोच ये है कि मनुष्य जो कुछ भी हासिल कर सकता है, वो कई लोगों की हज़ारों सालों के बोध से बनाई गई संगठित व्यवस्था के माध्यम से हासिल कर सके। अगर आपको सब कुछ अपने आप ही समझना हो तो ये वैसे ही है जैसे आप फिर से पहिये की खोज करें और फिर से बहुत सारी दर्दनाक प्रक्रियाओं में से होकर गुज़रें। पर, अगर आपको दूसरों के पाये ज्ञान से समझना है तो आप में विनम्रता होनी चाहिये।
