विशेषज्ञों की कड़ी चेतावनी: आज नहीं संभले तो कल इलाज भी बेबस होगा
पेज–1 : साइलेंट पेंडेमिक – जो दिखता नहीं, लेकिन मारक है
कोरोना जैसी महामारी ने दुनिया को यह सिखाया कि एक वायरस कैसे पूरी मानव सभ्यता को रोक सकता है। लेकिन अब विशेषज्ञ जिस खतरे की ओर इशारा कर रहे हैं, वह उससे भी अधिक खतरनाक है, क्योंकि यह धीरे-धीरे, बिना शोर के फैल रहा है। इस खतरे का नाम है एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस (Antimicrobial Resistance – AMR), जिसे अब ‘साइलेंट पेंडेमिक’ कहा जा रहा है।
एंटीबायोटिक दवाएं आधुनिक चिकित्सा की रीढ़ मानी जाती हैं। निमोनिया, टायफाइड, टीबी, सेप्सिस, यूरिन इंफेक्शन से लेकर सर्जरी के बाद होने वाले संक्रमण तक—हर जगह एंटीबायोटिक जीवन रक्षक भूमिका निभाती हैं। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब यही दवाएं जरूरत से ज्यादा, गलत बीमारी में, गलत मात्रा में और अधूरा कोर्स लेकर इस्तेमाल की जाती हैं।
जब बैक्टीरिया बार-बार एंटीबायोटिक के संपर्क में आते हैं, तो वे खुद को बदल लेते हैं। वे इतने ताकतवर हो जाते हैं कि दवाएं उन पर असर करना बंद कर देती हैं। यही स्थिति रेजिस्टेंस कहलाती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार,
“अगर एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस पर तुरंत नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले दशकों में यह मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा वैश्विक खतरा बन जाएगा।”
सबसे खतरनाक बात यह है कि
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यह समस्या न अचानक फैलती है
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न ही तुरंत मौत का कारण बनती है
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लेकिन एक समय बाद इलाज की हर दवा बेअसर हो जाती है
यही कारण है कि इसे साइलेंट पेंडेमिक कहा जा रहा है।
पेज–2 : एंटीबायोटिक का अंधाधुंध उपयोग – समस्या की जड़
1. हर बीमारी में एंटीबायोटिक की आदत
भारत में आम धारणा बन चुकी है कि बुखार, खांसी, जुकाम या गले में दर्द हुआ नहीं कि एंटीबायोटिक शुरू। जबकि सच्चाई यह है कि इनमें से 70–80% बीमारियां वायरल होती हैं, जिन पर एंटीबायोटिक का कोई असर नहीं होता।
2. बिना डॉक्टर की सलाह दवा
मेडिकल स्टोर से बिना पर्चे के एंटीबायोटिक मिल जाना एक बड़ी समस्या है। लोग पड़ोसी की सलाह, पुराने पर्चे या गूगल देखकर दवा लेना शुरू कर देते हैं।
3. अधूरा कोर्स – सबसे खतरनाक गलती
लक्षण ठीक होते ही दवा बंद कर देना बैक्टीरिया को और मजबूत बना देता है। कमजोर बैक्टीरिया मर जाते हैं, लेकिन ताकतवर बच जाते हैं और भविष्य में वही बीमारी ज्यादा खतरनाक रूप में लौटती है।
4. पशुपालन और पोल्ट्री फार्म
तेजी से मुनाफा कमाने के लिए मुर्गी, मछली और पशुओं को नियमित एंटीबायोटिक दी जाती हैं। यही दवाएं
5. अस्पतालों में लापरवाही
कई बार संक्रमण की पुष्टि से पहले ही “सुरक्षा के नाम पर” एंटीबायोटिक शुरू कर दी जाती है। यह आदत आने वाले समय के लिए घातक है।
पेज–3 : भविष्य की भयावह तस्वीर – अगर अभी नहीं रुके
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यही हाल रहा तो हम पोस्ट-एंटीबायोटिक युग में प्रवेश कर जाएंगे।
पोस्ट-एंटीबायोटिक युग क्या है?
ऐसा समय जब
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सामान्य संक्रमण भी जानलेवा होगा
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छोटी सर्जरी भी जोखिम भरी बन जाएगी
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डिलीवरी के बाद संक्रमण से मौत का खतरा बढ़ेगा
संभावित दुष्परिणाम
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टीबी जैसी बीमारी फिर से लाइलाज हो सकती है
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कैंसर मरीजों की कीमोथेरेपी जोखिम में पड़ जाएगी
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ICU में मौत की दर तेजी से बढ़ेगी
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इलाज का खर्च आम आदमी की पहुंच से बाहर हो जाएगा
एक अनुमान के अनुसार, आने वाले वर्षों में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस के कारण
विशेषज्ञों की चेतावनी
डॉक्टरों का कहना है:
“अगर एंटीबायोटिक खत्म हो गईं, तो आधुनिक चिकित्सा का आधा हिस्सा बेकार हो जाएगा।”
पेज–4 : समाधान, जिम्मेदारी और जागरूकता
यह संकट किसी एक देश या डॉक्टर की वजह से नहीं है। इसका समाधान भी सामूहिक प्रयास से ही संभव है।
आम नागरिक क्या करें
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डॉक्टर की सलाह के बिना एंटीबायोटिक न लें
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पूरा कोर्स जरूर करें, चाहे तबीयत ठीक हो जाए
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वायरल बीमारियों में एंटीबायोटिक की मांग न करें
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बची हुई दवाएं दूसरों को न दें
डॉक्टर और अस्पताल स्तर पर
सरकार और नीति स्तर पर
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बिना पर्चे की बिक्री पर सख्त नियंत्रण
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पशुपालन में एंटीबायोटिक उपयोग सीमित करना
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स्कूल और मीडिया के जरिए जन-जागरूकता अभियान
निष्कर्ष : आज की लापरवाही, कल की त्रासदी
एंटीबायोटिक कोई साधारण दवा नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की अमूल्य धरोहर है। इसका दुरुपयोग हमें उस दौर में ले जा सकता है, जहां इलाज होते हुए भी जान नहीं बचेगी।
अब भी समय है।
अगर आज हमने समझदारी दिखाई, तो आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य दे सकते हैं।
संदेश साफ है:
“एंटीबायोटिक सोच-समझकर लें, सही मात्रा में लें और पूरा कोर्स लें — क्योंकि आपकी एक गलती पूरी दुनिया पर भारी पड़ सकती है।”
