दुर्गा मंदिर से आई पावन हल्दी, टेढ़ीनीम महंत आवास में भव्यता के साथ संपन्न हुआ गौने का अनुष्ठान वेद मंत्रों, शंखध्वनि और मंगलगीतों के बीच काशी बनी साक्षी—रंगभरी एकादशी तक चलेगा मांगलिक क्रम
वाराणसी । देवाधिदेव की अनादि नगरी काशी में मंगलवार की संध्या शिव–गौरा विवाह परंपरा का अत्यंत भावपूर्ण और लोकआस्था से ओत-प्रोत अध्याय साकार हो उठा। माता गौरा के गौने की परंपरागत हल्दी रस्म टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास में विधि-विधानपूर्वक संपन्न हुई। 108 थालो में भोग के साथ नौ गौरी–नौ दुर्गा के आव्हान मंत्रों से अभिमंत्रित पावन हल्दी जब माता गौरा की चल प्रतिमा के अंग-अंग पर अर्पित की गई, तब पूरा परिसर ‘हर-हर महादेव’ और ‘जय गौरा’ के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा। यह आयोजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि काशी की जीवंत सांस्कृतिक चेतना और लोकविश्वास का अद्भुत संगम है, जहां देवी-देवताओं को परिवार का सदस्य मानकर उनके विवाह और गौने की रस्में उसी आत्मीयता से निभाई जाती हैं, जैसे किसी घर-आंगन में बेटी का गौना होता है। दुर्गा मंदिर में हुआ विशेष पूजन, मंत्रोच्चार से अभिमंत्रित हुई हल्दी गौने की हल्दी की परंपरा के अनुसार मंगलवार प्रातः काशी के प्रसिद्ध दुर्गा मंदिर में विशेष अनुष्ठान संपन्न हुआ। वैदिक ब्राह्मणों ने नौ गौरी और नौ दुर्गा के आव्हान मंत्रों के साथ हल्दी का विधिवत पूजन किया। मंदिर के महंत कौशल द्विवेदी ने बताया कि यह हल्दी केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि श्रद्धा और शास्त्र का सजीव रूप है। काशी की लोकपरंपरा के अनुसार गौरा के गौने की जिम्मेदारी स्वयं काशीवासियों की होती है। विवाह के उपरांत जिस प्रकार कन्या को ससुराल विदा करने से पूर्व हल्दी की रस्म निभाई जाती है, उसी भाव से माता गौरा को भी यह मंगल अनुष्ठान अर्पित किया जाता है। पूजन उपरांत महंत परिवार के पंडित कौशल पति द्विवेदी, पंडित केवल कृष्ण द्विवेदी, पंडित आनंद गोपाल द्विवेदी, अवनीश शुक्ला, संजय दुबे के साथ शोभायात्रा के रूप में हल्दी को टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास तक पहुंचाया। टेढ़ीनीम महंत आवास में सजा मंगल मंडप सायंकाल टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास में भव्य मंगल मंडप सजाया गया। रंग-बिरंगे पुष्पों, आम्रपल्लव और पारंपरिक सजावट से सुसज्जित परिसर श्रद्धा और उल्लास का केंद्र बना रहा। काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत पं. वाचस्पति तिवारी के सान्निध्य में 11 वैदिक ब्राह्मणों ने माता गौरा की चल प्रतिमा का विशेष पूजन कराया। वेदमंत्रों की गूंज के बीच माता को मंडप में विराजमान कराया गया। इसके पश्चात परंपरागत रीति से अभिमंत्रित हल्दी अर्पित की गई। हल्दी चढ़ाने की इस रस्म के दौरान उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो किसी घर में बेटी का गौना संपन्न हो रहा हो। अनुष्ठान के उपरांत माता गौरा का भव्य श्रृंगार किया गया। पारंपरिक बनारसी वस्त्र, रत्नाभूषण, पुष्पमालाएं और सिन्दूरी आभा से सुसज्जित स्वरूप ने श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। दर्शन के लिए उपस्थित श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देर रात तक लगी रहीं महंत परिवार के अनुसार इस वर्ष भी परंपरा की मर्यादा और शास्त्रीय विधानों का विशेष ध्यान रखा गया। सभी अनुष्ठान निर्धारित विधान के अनुरूप संपन्न हुए। गौने की हल्दी रस्म में लोकजीवन की आत्मीयता स्पष्ट दिखाई दी। जैसे ही हल्दी अर्पण हुआ, महंत आवास में महिलाओं द्वारा पारंपरिक मंगलगीत और सोहर गूंज उठे। गीतों में दुल्हन की विदाई, ससुराल और शुभकामनाओं के भाव झलक रहे थे। काशी की मान्यता है कि बाबा और गौरा नगर के आराध्य ही नहीं, बल्कि पारिवारिक सदस्य हैं। यही कारण है कि यह आयोजन सामूहिक उत्सव का रूप ले लेता है। श्रद्धालु स्वयं को इस दैवीय पारिवारिक समारोह का सहभागी मानते हैं। रविन्द्र गुप्ता 151009219
