वाराणसी । कायचिकित्सा विभाग, बीएचयू के तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन और पूर्व छात्र मिलन समारोह 'काशी-काया संगमम' के तीसरे और अंतिम दिन की शुरुआत वैज्ञानिक सत्र 8 (पद्मश्री प्रो. आर. एच. सिंह स्मृति सत्र) से हुई, जिसमें मुख्य वक्ता डॉ. मनीष मिश्रा ने बताया कि विश्व में लगभग 1.71 बिलियन लोग न्यूरोमस्कुलर स्केलेटल विकारों (MSDS) से पीड़ित हैं और शहरी क्षेत्रों में इसके मामले बढ़ रहे हैं। उन्होंने 'वात-व्याधि' के प्रबंधन के लिए आयुर्वेद, आधुनिक चिकित्सा, फिजियोथेरेपी और योग के संयुक्त सहयोग पर जोर दिया तथा देश में 'वातरक्त' (गाउट) के उपचार केंद्रों की कार्यप्रणाली समझाई।
इसके बाद 12 शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए, इसके पश्चात वैज्ञानिक सत्र 10 (प्रो. बी. एन. उपाध्याय स्मृति सत्र) में डॉ. बी. एन. मौर्य ने बीएचयू के पूर्व छात्र के रूप में अपने अनुभव साझा किए और रुमेटोइड विकार का एक केस प्रस्तुत करते हुए इसे वात-व्याधि और 'आमवात' के परिप्रेक्ष्य में समझाया, जिसके बाद 15 और शोध पत्र पढ़े गए।
प्लेनरी सह पूर्व छात्र मिलन और कीनोट सत्र के पहले भाग में डॉ. अर्पित कुमार, डॉ. विनोद सिंह, डॉ. राहुल परियार, डॉ. राजेश जैन, डॉ. जसप्रीत सिंह सोढी और डॉ. हरिकिशन पारिख जैसे पूर्व छात्रों ने विभाग से जुड़ी अपनी यादें साझा कीं। कीनोट सत्र में प्रो. रामाकांत यादव ने मस्कुलोस्केलेटल विकारों में दर्द प्रबंधन की सफलता की कहानियाँ साझा करते हुए कहा कि किसी भी दर्दनाक स्थिति के प्रबंधन से पहले 'आम' (Ama) का आकलन सबसे महत्वपूर्ण है। इसके बाद आमंत्रित व्याख्यान सत्र में प्रो. रिजु अग्रवाल ने इडियोपैथिक ओकुलोमोटर पाल्सी के आयुर्वेदिक उपचार पर तीन सफल मेडिकल केस प्रस्तुत किए।
दूसरे वक्ता डॉ. जेद्द गणपति भट्ट ने नैदानिक अभ्यास में 'क्रियाकाल विमर्श' पर चर्चा करते हुए 'स्थान संश्रय' चरण को महत्वपूर्ण बताया और कहा कि चिकित्सक को केवल बीमारी के नाम का नहीं बल्कि उसके चरण (Stage) का उपचार करना चाहिए। अंत में डॉ. नितिन शर्मा ने विभाग की यादें साझा कीं और 'वातरक्त' तथा गाउट के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए अपना शोध प्रस्तुत किया। यह पूरा आयोजन विभिन्न प्रतिष्ठित प्रोफेसरों की अध्यक्षता और समन्वय में संपन्न हुआ ।। रविन्द्र गुप्ता
