भारत की प्राचीन खेल एवं योग परंपराओं में शामिल मलखंभ आज आधुनिकता की दौड़ में कहीं खोती नजर आ रही है, लेकिन मथुरा के कुछ विद्यालय इसे फिर से जीवंत करने का सराहनीय प्रयास कर रहे हैं। जब बच्चे मोबाइल और वीडियो गेम की दुनिया में उलझते जा रहे हैं, तब इन विद्यालयों ने उन्हें लकड़ी के खंभे और रस्सी से जुड़ी उस विद्या से परिचित कराया है, जो कभी भारत की शौर्य और संतुलन की पहचान हुआ करती थी।
मथुरा के कृष्ण चंद गांधी सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज, माधव कुंज ने इस दिशा में विशेष पहल करते हुए विद्यालय परिसर में मलखंभ प्रशिक्षण शुरू किया है। विद्यालय के आचार्य विक्रम सिंह एवं विजय पाल सिंह बच्चों को इस प्राचीन विद्या में पारंगत बनाने की दिशा में निरंतर प्रयासरत हैं। उनके मार्गदर्शन में छात्र न केवल खेल सीख रहे हैं, बल्कि अनुशासन, साहस और आत्मविश्वास का भी पाठ पढ़ रहे हैं।
मलखंभ केवल खेल नहीं, बल्कि शरीर और मन दोनों को साधने की साधना है। इसमें खिलाड़ी लकड़ी के खंभे या रस्सी पर चढ़कर विभिन्न योगासन और करतब प्रस्तुत करता है। यह अभ्यास शरीर की लचक, संतुलन, ताकत और एकाग्रता को अद्भुत रूप से बढ़ाता है। नियमित अभ्यास से बच्चों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं, रीढ़ की हड्डी लचीली बनती है, मोटापा कम होता है और आत्मविश्वास कई गुना बढ़ जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मलखंभ से बच्चों में अनुशासन, साहस और मानसिक दृढ़ता विकसित होती है। जहां जिम की मशीनें केवल शरीर गढ़ती हैं, वहीं मलखंभ व्यक्तित्व गढ़ता है। यह खेल बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ता है और भारतीय परंपराओं के प्रति गर्व की भावना पैदा करता है।
विद्यालय प्रशासन का कहना है कि आज आवश्यकता इस बात की है कि अन्य शिक्षण संस्थान भी इस प्राचीन विद्या को अपने पाठ्यक्रम या खेल गतिविधियों में शामिल करें, ताकि आने वाली पीढ़ी केवल डिजिटल दुनिया की नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक धरोहर की भी वारिस बने।
आज समय की मांग है कि हम अपनी परंपराओं को केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि जीवन में उतारें। मलखंभ जैसी प्राचीन विद्या को पुनर्जीवित करना केवल खेल को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति को मजबूत करना है। यदि हर विद्यालय इस दिशा में एक कदम बढ़ाए, तो निश्चित ही आने वाली पीढ़ी मोबाइल की स्क्रीन से नजर हटाकर अपनी विरासत को मजबूती से थाम लेगी।
रिपोर्ट नन्द किशोर शर्मा 151170853
