फास्ट न्यूज इंडिया यूपी प्रतापगढ़। रामानुज आश्रम के धर्माचार्य ओमप्रकाश पांडे अनिरुद्ध रामानुज दास ने कहा कि आज समाज में कुछ लोग चलते-फिरते, बातचीत करते हुए माला जपते दिखाई देते हैं और स्वयं को संत व ज्ञानी बताते हैं, जबकि यह आचरण शास्त्रों के विरुद्ध है। शास्त्रों का अध्ययन किए बिना केवल बाह्य आडंबर से धार्मिकता प्रदर्शित करना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि एक और कुप्रथा तेजी से फैल रही है—पूजन प्रारंभ होते ही रूमाल या तौलिया सिर पर रख लेना। कई बार पुजारी और कर्मकांड कराने वाले भी इस पर आपत्ति नहीं करते, जबकि शास्त्रों में देवपूजन, जप और प्रणाम के समय सिर ढकने का निषेध है। शास्त्रों के अनुसार केवल शौच के समय सिर ढकने का विधान है। जप, ध्यान और देवपूजा में पुरुषों को सिर खुला रखना चाहिए, तभी शास्त्रोक्त फल की प्राप्ति होती है। वहीं स्त्रियों के लिए सिर पर वस्त्र रखना शास्त्रसम्मत है। धर्माचार्य दास ने बताया कि शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख है कि पगड़ी पहनकर, गले में वस्त्र लपेटकर, शिखा खोलकर, बिना कच्छ धारण किए, अशुद्ध अवस्था में, बोलते हुए अथवा चलते-फिरते किया गया जप निष्फल हो जाता है। उन्होंने कुर्म पुराण, योगी याज्ञवल्क्य, शब्द कल्पद्रुम, रामार्चनचंद्रिका एवं शिव महापुराण (उमा खंड) सहित अनेक शास्त्रीय ग्रंथों का हवाला देते हुए कहा कि आचमन, जप और ध्यान से पूर्व शारीरिक शुद्धता, वस्त्रों की मर्यादा और मन की एकाग्रता अनिवार्य है। जूते पहनकर, जल में खड़े होकर या सिर ढककर आचमन तक करना निषिद्ध बताया गया है।धर्माचार्य ने समाज से अपील की कि शास्त्रों की मर्यादा को समझें, आडंबर नहीं बल्कि विधि-विधान से पूजा-जप करें, ताकि धार्मिक कर्मों का वास्तविक फल प्राप्त हो सके। रिपोर्ट विशाल रावत 151019049
