मथुरा । देश में पत्रकारों पर बढ़ते हमले अब केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं रह गए हैं, बल्कि यह सीधे तौर पर लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बन चुके हैं। इसके बावजूद संसद और सरकार की चुप्पी कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। इन्हीं सवालों के बीच राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा परिषद ने एक बार फिर केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा किया है।
संगठन के मंडल उपाध्यक्ष गोपाल चतुर्वेदी ने संसद से दो टूक शब्दों में कहा है कि जब तक पत्रकारों के लिए कड़ा, प्रभावी और दंडात्मक राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून नहीं बनेगा, तब तक “संविधान का चौथा स्तंभ केवल नाम का स्तंभ बनकर रह जाएगा।”
गोपाल चतुर्वेदी ने आरोप लगाया कि सत्ता के गलियारों में बैठे लोग लोकतंत्र की बात तो करते हैं, लेकिन सच लिखने और सच दिखाने वालों की सुरक्षा को लेकर उनकी प्राथमिकताएं शून्य हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में पत्रकारों पर हमले, हत्या, झूठे मुकदमे और प्रशासनिक उत्पीड़न की घटनाएं यह साबित करती हैं कि मौजूदा व्यवस्था पत्रकारों को सुरक्षा देने में पूरी तरह विफल रही है।
उन्होंने संसद से सवाल किया कि जब उद्योगों, अफसरों और जनप्रतिनिधियों के लिए विशेष सुरक्षा और कानून बनाए जा सकते हैं, तो जनता की आवाज बनने वाले पत्रकारों के लिए कानून बनाने में राजनीतिक इच्छाशक्ति क्यों नहीं दिखाई जाती?
राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा परिषद ने स्पष्ट शब्दों में मांग की है कि इसी संसद सत्र में पत्रकार सुरक्षा कानून को सदन में लाया जाए और उसे पारित किया जाए। संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि इस मांग को लगातार नजरअंदाज किया गया, तो यह सरकारों द्वारा प्रेस की स्वतंत्रता को कमजोर करने के प्रयास के रूप में देखा जाएगा।
परिषद ने सभी राजनीतिक दलों से अपील की है कि वे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर यह तय करें कि वे लोकतंत्र के साथ खड़े हैं या सत्ता की असहज सच्चाइयों से भाग रहे हैं।
रिपोर्ट नन्द किशोर शर्मा 151170853
