सरकारी स्कूल में पढ़ाई नहीं, बच्चों से कराए जा रहे निजी और गैर-शैक्षणिक काम
फास्ट न्यूज़ इंडिया मध्य प्रदेश शिवपुरी पिछोर। सरकारी स्कूलों में अभिभावक अपने बच्चों को इस उम्मीद के साथ भेजते हैं कि उन्हें बेहतर शिक्षा मिलेगी और उनका भविष्य संवरेगा, लेकिन शासकीय माध्यमिक विद्यालय क्रमांक-1 पिछोर से सामने आया मामला सरकारी शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलने वाला है। यहां पढ़ाई के नाम पर बच्चों से गैर-शैक्षणिक और निजी कार्य कराए जाने के गंभीर आरोप सामने आए हैं, जिसका वीडियो भी मौजूद है।
वीडियो में साफ तौर पर देखा जा सकता है कि एक छोटा बच्चा प्लास्टिक का जग और कपड़े टांगने का हैंगर लेकर स्कूल परिसर में पहुंचा है। जब बच्चों से पूछा गया कि वे यह सामान कहां ले जा रहे हैं, तो बच्चों ने बताया कि यह सामान टीचर द्वारा मंगवाया गया है। सवाल उठता है कि स्कूल में पढ़ाई के समय बच्चों को बाजार और घरेलू सामान लाने में क्यों लगाया जा रहा है?
कक्षा 2 के बच्चों से कराई जा रही गेटदारी
मामला यहीं खत्म नहीं होता। स्कूल में कक्षा 2 के छोटे-छोटे बच्चों की ड्यूटी स्कूल का गेट खोलने और बंद करने में लगाई गई है। जब बच्चों से पूछा गया कि क्या उनकी लंच हो चुकी है, तो उन्होंने बताया कि अभी तक लंच नहीं हुई है।
गेट लगाने की जिम्मेदारी किसने दी—इस पर बच्चों ने साफ कहा कि प्रिंसिपल मैडम ने ऐसा करने को कहा था।
यह स्थिति न केवल शिक्षा के अधिकार कानून (RTE) की भावना के खिलाफ है, बल्कि बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।
गरीब बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़
स्थानीय लोगों और अभिभावकों का कहना है कि दिन-ब-दिन सरकारी स्कूलों की पढ़ाई-लिखाई बदतर होती जा रही है। इन स्कूलों में ज्यादातर गरीब और मजदूर वर्ग के बच्चे पढ़ने आते हैं, जिनके पास निजी स्कूलों का विकल्प नहीं होता। ऐसे में जब उन्हें पढ़ाई के बजाय खेलकूद और अन्य गैर-जरूरी कामों में उलझा दिया जाता है, तो यह सीधे-सीधे उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ है।
क्लास टाइम में पढ़ाई के बजाय गपशप और मोबाइल
आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि कई बार जब शिक्षक फ्री होते हैं, तो आपस में गपशप में समय बिताया जाता है, और कई मौकों पर क्लास टाइम में मोबाइल चलाते हुए भी शिक्षक देखे गए हैं। इससे बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह प्रभावित हो रही है।
जांच का आश्वासन, कार्रवाई पर सवाल
इस पूरे मामले को लेकर बीआरसीसी सुरेश गुप्ता से बात की गई। उन्होंने कहा—
“मैं इस मामले की जांच करवा लेता हूं।”
हालांकि, सिर्फ जांच के आश्वासन से अभिभावकों और आमजन की चिंता दूर नहीं हो रही है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि—
क्या यह मामला सिर्फ कागजी जांच तक सीमित रह जाएगा?
या फिर जिम्मेदार शिक्षकों और स्कूल प्रबंधन पर ठोस और कठोर कार्रवाई होगी?
क्या शिक्षा विभाग मासूम बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए कोई सख्त कदम उठाएगा?
यदि समय रहते इस तरह के मामलों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर और गिरता चला जाएगा, और इसका सबसे बड़ा नुकसान उन बच्चों को होगा, जिनकी पूरी उम्मीद सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर टिकी हुई है। रिपोर्टर राजू जाटव पिछोर
