EPaper Join LogIn
एक बार क्लिक कर पोर्टल को Subscribe करें खबर पढ़े या अपलोड करें हर खबर पर इनकम पाये।

शिक्षा में भय का बढ़ता माहौल लोकतंत्र और संविधान के लिए गंभीर खतरा
Link
  • 151186542 - VIMALESH 32 55
    01 Feb 2026 12:55 PM



शिक्षा में भय का बढ़ता माहौल लोकतंत्र और संविधान के लिए गंभीर खतरा : संतुलित सुधार की आवश्यकता।।

मध्य प्रदेश भिंड । पुखराज भटेले जिला महामंत्री--राष्ट्रीय सनातन सेना भारत के नेतृत्व में सेंकड़ों समर्थकों के साथ UGC काले कानून के विरोध में आज जन आंदोलन और आयोजित प्रेस वार्ता में वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि यह कोई राजनीतिक बयान, आरोप या विरोध प्रदर्शन नहीं है, बल्कि शिक्षा की आत्मा, संविधान की गरिमा और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय है।

वक्ताओं ने कहा कि देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में एक ऐसा मौन फैलता जा रहा है, जो शोर से अधिक खतरनाक है। यह मौन भय का है—जो विद्यार्थियों को सवाल पूछने से रोकता है, स्वतंत्र सोच को दबाता है और अंततः सीखने की पूरी प्रक्रिया को नुकसान पहुँचाता है। यह समय किसी एक नियम के विरोध का नहीं, बल्कि यह आत्ममंथन करने का है कि क्या हम शिक्षा को भय के हवाले करने जा रहे हैं।

प्रेस वार्ता में यह भी स्पष्ट किया गया कि यह मुद्दा किसी जाति, वर्ग, समुदाय या समूह के विरुद्ध नहीं है। यह अधिकारों की प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि संवैधानिक संतुलन की माँग है। वक्ताओं ने कहा कि किसी वर्ग की सुरक्षा आवश्यक हो सकती है, लेकिन सुरक्षा के नाम पर असंतुलन और न्याय के नाम पर एकतरफापन संविधान की मंशा नहीं हो सकता। यह लड़ाई टकराव की नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण और संतुलित सुधार की है।

संविधान का उल्लेख करते हुए कहा गया कि अनुच्छेद 14 समानता, अनुच्छेद 21 गरिमा एवं भयमुक्त जीवन और अनुच्छेद 21A शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करता है। शिक्षा केवल कक्षा में उपस्थिति भर नहीं है, बल्कि वह ऐसा वातावरण मांगती है जहाँ विद्यार्थी निडर होकर प्रश्न पूछ सके, असहमति रख सके और यह विश्वास कर सके कि न्याय उसके साथ है। यदि किसी छात्र या शिक्षक के मन में यह भय बैठ जाए कि एक आरोप या शिकायत उसका भविष्य नष्ट कर सकती है, तो ऐसी शिक्षा अधिकार नहीं, बल्कि आशंका बन जाती है—जो संविधान की आत्मा के विपरीत है।

वक्ताओं ने Natural Justice के सिद्धांत पर ज़ोर देते हुए कहा कि हर आरोप की निष्पक्ष सुनवाई, हर पक्ष को समान अवसर और हर निर्णय में संतुलन अनिवार्य है। किसी भी शिकायत प्रणाली की विश्वसनीयता तभी होती है जब उसमें आरोप लगाने का अधिकार हो और साथ ही झूठे या दुर्भावनापूर्ण आरोपों से बचाव का स्पष्ट मार्ग भी मौजूद हो। दंड का भय हो लेकिन निष्पक्ष जांच की गारंटी न हो, तो ऐसी व्यवस्था न्याय नहीं बल्कि मनमानी बन जाती है।

प्रेस वार्ता में चेताया गया कि आज की चुप्पी कल अंधकार में बदल सकती है। शिक्षा में स्वीकार किया गया भय आगे चलकर नौकरी, प्रशासन और सामाजिक सम्मान तक फैलता है, जिसका सबसे बड़ा नुकसान बच्चों और भविष्य की पीढ़ियों को होता है। जो पीढ़ी सवाल करना छोड़ देती है, वह भविष्य गढ़ने की क्षमता भी खो देती है।

प्रशासन से निम्नलिखित स्पष्ट और संतुलित मांगें रखी गईं:

सभी छात्रों और शिक्षकों के लिए समान शिकायत और संरक्षण अधिकार सुनिश्चित किए जाएँ।

झूठी अथवा दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर न्यायसंगत, पारदर्शी और स्पष्ट दंडात्मक प्रावधान हों।

जांच प्रक्रिया में निष्पक्षता, पारदर्शिता और समयबद्धता को अनिवार्य किया जाए।

संबंधित नियमों की पुनः समीक्षा कर उन्हें संविधान की भावना के अनुरूप संतुलित किया जाए।

मीडिया और समाज से अपील की गई कि इस विषय को सनसनी के बजाय संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ देखा जाए और इसे आज की राजनीति से ऊपर उठकर कल के भारत के प्रश्न के रूप में समझा जाए, क्योंकि शिक्षा से जुड़े निर्णय दशकों तक देश की दिशा तय करते हैं।

प्रेस वार्ता का समापन इन शब्दों के साथ किया गया कि

“हम किसी के खिलाफ नहीं, संविधान के साथ खड़े हैं। हम डर के नहीं, न्याय, संतुलन और भविष्य के पक्ष में खड़े हैं। यह चेतावनी नहीं, संविधान की पुकार है। देखे विमलेश की रिपोट 

20260201125201296886253.mp4

20260201125207664347874.mp4

20260201125213443565874.mp4



Subscriber

188448

No. of Visitors

FastMail

VARANASI - यूजीसी को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू, काशी में छात्रों और विभिन्न संगठनों ने दी चेतावनी     Sonbhadra - यूजीसी की नीतियों के खिलाफ सवर्ण आर्मी का प्रदर्शन, ज्ञापन सौंपकर जताया विरोध     बुलंदशहर - डिलीवरी के दौरान नवजात की गर्दन हुई धड़ से अलग, मां के गर्भाशय में ही रह गया गला     BALLIA - सरस्वती पूजा में शामिल होने के लिए निकला था युवक, पेड़ से लटकता मिला शव     VARANASI - नेपाल भागने की फिराक में था विकास सिंह नरवे