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योनि मुद्रा (ज्योति मुदा)-योनि का अर्थ है
  • 151168597 - RAJESH SHIVHARE 0 0
    07 Jan 2026 11:33 AM



योनि मुद्रा (ज्योति मुदा)-योनि का अर्थ है

 

-अधिष्ठान(निवास स्थान)।यही वह अधिष्ठान है जहाँ योगी स्थिर हो कर आदि शक्ति में लीन होता है।आदि शक्ति,ललिताम्बा,त्रिपुरसुंदरी यहाँ अधिष्ठात्री हैं।

"योनिमुद्रा त्रिखण्डेशी त्रिपुराम्बा त्रिकोणगा"

 

कतिपय साधकों के अनुसार,लाहिड़ी महाशय कहते थे कि योनि मुद्रा का अभ्यास रात्रि में ही करना चाहिए।परंतु इसे सत्य नही माना जा सकता।योनि मुद्रा ध्यान की अवस्था में एक विशिष्ठ सोपान है तथा क्रिया के अभ्यास के पहले तथा बाद में भी माता की कृपा होती है।

 

योनि मुद्रा एक स्वयम्भू मुद्रा है तथा इस मुद्रा के संदर्भ में,यद्यपि साधक को अभ्यास करना होता है,अभ्यास शब्द उचित प्रतीत नही होता।यही बात महा मुद्रा तथा खेचरी मुद्रा के संदर्भ में भी सत्य है।ये मुद्राएं योगी की उन्नत क्रमविकास की पराकाष्टा की ओर संकेत करती हैं।अंतः अभ्यास शब्द के स्थान पर मै "प्रणाम" शब्द का प्रयोग करता हूँ।

 

आज्ञा चक्र के माध्यम से भ्रूमध्य में योनि(त्रिकोण) का दर्शन माता की कृपा से ही सम्भव होता है।वर्षों की साधना के बाद ही योगी पात्र हो पाता है।योगी को कूटस्थ ज्योति के दर्शन होते हैं।

 

विधि-

 

1-आरम्भ में खेचरी मुद्रा के बिना भी योनि मुद्रा को प्रणाम कर सकते हैं।

 

2-आँखे तथा मुख बन्द कर क्रिया प्राणायाम की तरह ही प्राण ऊर्जा को मूलाधार से ऊपर खींचना शरू करें तथा बिंदु(मेडुला) तक ले कर आएं।

 

साथ ही अपने दोनों हाथों की कुहनियों को ऊपर उठाते हुए अँगुलियों को चेहरे के समीप लाएं।यहाँ उद्देश्य है कि हमारी आँखे,मुख, कान तथा नासिकॉ छिद्र अँगुलियों द्वारा पूर्ण रूपेण बन्द किये जाएं।

 

लेखकों ने नियम भी बना दिए हैं,जैसे कानों को अंगूठों से,होठों को अनामिका से इत्यादि।

 

मेरा सुझाव है कि आप अपनी सुविधा से अँगुलियों का प्रयोग करें।कालांतर में नासिका छिद्र एवम् होठों के लिए अँगुलियों के प्रयोग की आवश्यकता ही नही पड़ती।संक्षेप में,समस्त द्वार जहाँ से ऊर्जा बाहर जा सकती है,बन्द होने चाहिए।

 

ध्यान रहे,नासिका छिद्र बन्द करने के पूर्व आपका ऊर्जा आरोहण(inhalation) पूर्ण हो जाना चाहिए।

 

3-ऊर्जा का आरोहण पूर्ण है;समस्त द्वार बन्द हैं,ऊर्जा मस्तक में घनीभूत है तथा इन्द्रिय संयम का प्रकाश रुपी ओज भ्रूमध्य की ओर जा रहा है।

 

इस अवस्था में ऊर्जा स्वतः भ्रूमध्य की ओर गमन करेगी।कुछ ही क्षणों में साधक को प्रकाशमयी अखण्ड मंडल के दर्शन होंगे।साधक तब तक उस अवस्था में स्थिर रहे जहाँ तक वह सहज हो।श्वास को रोके रखना है तब तक कि साधक सहज रह सके।कूटस्थ के दर्शन की अवस्था में भ्रूमध्य में ॐ का जप करें।

 

4-अब साधक को श्वास(प्राण ऊर्जा) छोड़नी है(क्रिया प्राणायाम की तरह मूलाधार तक)।

 

यह एक प्रणाम हुआ।ऐसे तीन प्रणाम करें।प्रत्येक प्रणाम के पश्चात् साधक अपने हाथों को यथास्थान रख सकता है तथा उन्हें वापस भी ला सकता है।यथास्थान ही रखना श्रेयस्कर होगा जिससे संचित ऊर्जा बाहर न जा सके एवम् साधक अंतर्मुखी बना रहे।

 

अतः आप योनि मुद्रा में भी तीन क्रिया प्राणायाम करते हैं।

 

जैसा मैंने कहा कि ये मुद्राएं स्वयम्भू हैं।अतः साधक की अनुभूति जो कुछ भी लिखा गया है,उसकी तुलना में अलग एवम् अद्वितीय हो सकती है।कुछ साधकों को ॐ का नाद भी सुनाई पड़ता है।

 

प्रणाम के पश्चात् भी कूटस्थ ज्योति ललाट में मंडराती हैं।साधक को पूर्ण निष्ठा के साथ ज्योति को प्रणाम कर अगाध शांति में डूबे रहना चाहिए।यह शांति ध्यान आसन से उठने के बाद भी साधक के हर क्रिया कलाप में परिलक्षित होती है।

 

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

 

 बिना गुरू साधना करना अपने विनाश को न्यौता देना है बिना गुरु आज्ञा साधना करने पर साधक पागल हो जाता है या म्रत्यु को प्राप्त करता है इसलिये कोई भी साधना बिना गुरु आज्ञा ना करेँ ।



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